करीब दस महीनों के बाद आज अपने ब्लॉग पर कुछ लिख रही हूँ। इतने दिनों न लिखने के बहुत ढेर सारे कारण हैं, उनको फिर कभी बताउंगी पर अभी बताती हूँ कि मैं क्यों फिर लिख पा रही हूँ...............इतने दिनों लिखा तो नहीं पर बहुत कुछ पढ़ा और बहुतों को पढ़ा। उस बहुत कुछ और बहुतों में से कुछ ने मेरे अन्दर फिर से नए प्राणसंचार कर दिए हैं जो मेरा दिल फिर से सोचने पर मजबूर हो गया है। या यूँ कहें कि मैं दिल के हांथो मजबूर हो गयी हूँ। उसे सोचने से नहीं रोक सकती। विचारों कि बाढ़ सी आगयी है। दिल दिमाग में झंझावात से उठ रहे हैं। मन बहुत बेचैन है। समझ में नहीं आता कि शुरू कहाँ से करूं...................अब उस आरम्भ का आरम्भ हो ही गया है तो शुरू से ही शुरू करती हूँ। सबसे पहले तो उन दोस्तों का शुक्रिया जिनके कारण मैं आज फिर यहाँ हूँ। क्योंकि जो आपके में ऊर्जा का संचार करे, जो आपको भूली राह दिखाए, जो आपको आगे बढ़ने को प्रेरित करे वो आपके दोस्त के अलावा और कौन हो सकता है। अब वो कौन हैं इसे एक अबूझ पहेली ही बना रहने देती हूँ।
(कुछ पंक्तियाँ याद आरही हैं.... पता नहीं किसकी हैं )
शुक्रिया ऐ मेरी गैरत को जगाने वाले
मुझको मालूम नहीं था मैं अभी ज़िंदा हूँ।
Friday, March 19, 2010
Saturday, May 30, 2009
बुलबुला
बरसात हो रही है.........जमीन पर पड़ती बूँदें.........बनते बिगड़ते बुलबुले.........इन्ही बुलबुलों सी ही तो है जिन्दगी.......एक पल बनती अगले ही पल बिगड़ती पर इन दो पलों के बीच एक पूरी जिंदगी। कश्मकश.......होड़......आपाधापी......संघर्ष.......औपचारिकता, यही जिंदगी के पर्याय बन गए हैं। लड़का हो या लड़की.........पैदा होते ही जीने की जद्दोदहद.........चीख चीख कर सांस खींच कर जिंदगी की शुरुआत........माँ की उंगली का सहारा ले कर पहली बार खड़ा होना, वो पहला कदम........माँ बाप के साथ जिंदगी की इसी भगदड़ में शामिल हो जाता है। आज स्कूल में दाखिला........फ़िर खेल कूद में ईनाम.........गायन भी तो सीखना है........अरे ! क्रिकेट क्लास तो रह ही गई........थोड़ा सा ठहराव..........फ़िर नया संघर्ष...........नौकरी ढूँढने का, लग जाय तो उन्नति..........विदेश कैसे जाऊं..........हाय कहीं कोई मुझसे आगे न निकल जाय..........उसको पछाड़ दिया..........इसको पीछे छोड़ दिया..........बड़ी उपलब्धि........तब एक और नई जिंदगी साथ जुड़ जाती है इसी आपाधापी में वही भगदड़ वही मारामारी.......बच्चे हुए तो किस्सा शुरू से शुरू.........सारे रिश्ते नाते औपचारिकता भर रह गए। यहाँ तक की खुशियों के साथ भी औपचारिकता ही निभाते रहे। मनाया तो हर एक छोटी से छोटी खुशी का भी बड़ा सा जश्न, पर उसके पीछे भी कुछ जोड़तोड़........कहीं दिखावा........कभी होड़........कभी किसी की खुशामद.......कभी किसी पर एहसान। जिंदगी काट ली, जी नही.......पर हाय यह क्या !!!!!!!! सब थम गया........बुलबुला तो फूट गया........ढेरों नए बनते बिगड़ते हैं पर वो वाला कहाँ है ?????????? वो तो विलीन हो गया उसी अनंत में जहाँ से आया था।
फ़िर क्या मायने रखती है यह अंधी दौड़.........जहाँ आदमी आदमी के सर पर पाँव रख कर ऊपर बढ़ने में लगा है.........इन बनते बिगड़ते बुलबुलों को देख कर यही सोच रही हूँ। क्योंकि इन्ही में से एक बुलबुला मैं भी तो हूँ।
फ़िर क्या मायने रखती है यह अंधी दौड़.........जहाँ आदमी आदमी के सर पर पाँव रख कर ऊपर बढ़ने में लगा है.........इन बनते बिगड़ते बुलबुलों को देख कर यही सोच रही हूँ। क्योंकि इन्ही में से एक बुलबुला मैं भी तो हूँ।
Thursday, April 23, 2009
कहानी..........बीज
उसका जन्म हो चुका था..........पर वो संसार के लिया अदृश्य था...........वो जीवन के अन्य रूप की परतों के भीतर छुपा था..........वो एक बीज था। एक विशाल वृक्ष के ढेरों फलों में से एक के भीतर छुपा..........जीवन का आरंभ..........एक बीज। सब कुछ अनोखा था उसके लिए, वो फल की सुरक्षा में प्रतिदिन बढ़ रहा था.........उसका जीवन प्रत्येक दिन के साथ विकसित हो रहा था।
जैसे हर जीव अपने भविष्य से अनजान है, उसे भी अपने आने वाले दिनों का कुछ ज्ञान न था। पर कुछ तो था जो बदल रहा था। बीज हैरान था..........जिस सरसता में वो जी रहा था वो हर दिन के साथ कम हो रहीथी........शुष्कता बढ़ती जा रही थी..........वो सिमटता जा रहा था..........समझ नहीं पा रहा था की क्या हो रहा है और क्या होने जा रहा है..........हर नए दिन के साथ आने वाले दिन की प्रतीक्षा करता रहा।
एक दिन वो हो गया जो उसने सोचा भी न था। फल वृक्ष से अलग हो गया..........गिरते समय शाख से टकराया और टूट गया.........बीज बाहर आगया........उसका आवरण , उसका कवच छूट गया..........हवा के वेग से वो इधर उधर उड़ने लगा.........घबरा गया, डर के मारे और भी सिकुड़ गया..........उसकी रंगत भी भय से पीली पड़ गई। हवा के आगे उसकी एक न चली, वो जहाँ चाहती उसे उड़ा ले जा रही थी, कभी दायें कभी बाएँ कभी ऊपर कभी नीचे..........फ़िर वो एक ही स्थान पर देर तक गोल गोल घूमता रहा..........हवा का वेग कम हुआ और बीज धरती पर गिर गया। वो इतना डर चुका था कि दम साधे पड़ा रहा..........अपनी आँखें भींचे.........अपना शरीर सिकोड़े..........धीरे धीरे उसपर मिट्टी कि परतें पड़ती गयीं..........वो अन्धकार के गर्त में दब सा गया..........एक निर्जीव की भांति जाने कब तक सोता रहा।
फ़िर आकाश में मेघ छाये..........जोर से बिजली कड़की.........मूसलाधार बरसात हुई..........पानी बरसा तो बरसता ही रहा...........पूरी धरती ही भीग गई...........पानी रिसता हुआ मिटटी की परतों को पार कर बीज तक जा पहुँचा। बीज उससे सराबोर हो गया.........उसमें ऊर्जा का संचार हुआ..........अपने अस्तित्व का अहसास हुआ..........धीरे से सर उठाया मिटटी कि परतों को धीरे से खिसका कर बाहर झाँका..............यह क्या!!!!!!!!! इतना उजाला.........सब कुछ धुला धुला............उसके भीतर हलचल होने लगी.........पुराने आवरण टूट गए............भीतर नए जीवन का आरम्भ होने लगा.............नयी कोपलें बाहर आ गयी..........धूप में नहा कर चटख हरा रंग ओढ़ लिया। चारों और देखा तो उसके जैसे ढेरों नए जीवन आकार ले रहे थे............उसका आत्मविश्वास और द्रढ़ होगया...........उसने अपनी जड़ों को और फैलाया, धरती को कस कर थाम लिया। अब वो बीज से एक पौधे में बदल चुका था।
ठंडी हवा का एक झोंका आया.......उसने लहरा कर अपने नए जीवन का स्वागत किया...........अब वो तैयार था.............अनेक रूपों और पड़ावों से होता हुआ कुछ नए बीजों को जन्म देने के लिए..............इस जीवन चक्र को दोहराने के लिए।
जैसे हर जीव अपने भविष्य से अनजान है, उसे भी अपने आने वाले दिनों का कुछ ज्ञान न था। पर कुछ तो था जो बदल रहा था। बीज हैरान था..........जिस सरसता में वो जी रहा था वो हर दिन के साथ कम हो रहीथी........शुष्कता बढ़ती जा रही थी..........वो सिमटता जा रहा था..........समझ नहीं पा रहा था की क्या हो रहा है और क्या होने जा रहा है..........हर नए दिन के साथ आने वाले दिन की प्रतीक्षा करता रहा।
एक दिन वो हो गया जो उसने सोचा भी न था। फल वृक्ष से अलग हो गया..........गिरते समय शाख से टकराया और टूट गया.........बीज बाहर आगया........उसका आवरण , उसका कवच छूट गया..........हवा के वेग से वो इधर उधर उड़ने लगा.........घबरा गया, डर के मारे और भी सिकुड़ गया..........उसकी रंगत भी भय से पीली पड़ गई। हवा के आगे उसकी एक न चली, वो जहाँ चाहती उसे उड़ा ले जा रही थी, कभी दायें कभी बाएँ कभी ऊपर कभी नीचे..........फ़िर वो एक ही स्थान पर देर तक गोल गोल घूमता रहा..........हवा का वेग कम हुआ और बीज धरती पर गिर गया। वो इतना डर चुका था कि दम साधे पड़ा रहा..........अपनी आँखें भींचे.........अपना शरीर सिकोड़े..........धीरे धीरे उसपर मिट्टी कि परतें पड़ती गयीं..........वो अन्धकार के गर्त में दब सा गया..........एक निर्जीव की भांति जाने कब तक सोता रहा।
फ़िर आकाश में मेघ छाये..........जोर से बिजली कड़की.........मूसलाधार बरसात हुई..........पानी बरसा तो बरसता ही रहा...........पूरी धरती ही भीग गई...........पानी रिसता हुआ मिटटी की परतों को पार कर बीज तक जा पहुँचा। बीज उससे सराबोर हो गया.........उसमें ऊर्जा का संचार हुआ..........अपने अस्तित्व का अहसास हुआ..........धीरे से सर उठाया मिटटी कि परतों को धीरे से खिसका कर बाहर झाँका..............यह क्या!!!!!!!!! इतना उजाला.........सब कुछ धुला धुला............उसके भीतर हलचल होने लगी.........पुराने आवरण टूट गए............भीतर नए जीवन का आरम्भ होने लगा.............नयी कोपलें बाहर आ गयी..........धूप में नहा कर चटख हरा रंग ओढ़ लिया। चारों और देखा तो उसके जैसे ढेरों नए जीवन आकार ले रहे थे............उसका आत्मविश्वास और द्रढ़ होगया...........उसने अपनी जड़ों को और फैलाया, धरती को कस कर थाम लिया। अब वो बीज से एक पौधे में बदल चुका था।
ठंडी हवा का एक झोंका आया.......उसने लहरा कर अपने नए जीवन का स्वागत किया...........अब वो तैयार था.............अनेक रूपों और पड़ावों से होता हुआ कुछ नए बीजों को जन्म देने के लिए..............इस जीवन चक्र को दोहराने के लिए।
Saturday, April 18, 2009
कमाल की कला..........फ़ूड आर्ट!
Thursday, April 16, 2009
कहानी........औरत
यह कहानी एक औरत की है............औरत............एक ऐसी औरत जो सभी घटनाओं का केन्द्र थी फ़िर भी उसका महत्त्व किसी ने नहीं समझा और जब समझा तब बहुत देर हो चुकी थी।
वो औरत................एक व्यापारी के घर पैदा हुई...........कन्या रत्न की प्राप्ति घाटे में डूबे पिता के घर में...........जन्म से ही उपेक्षित रही। पिता ने तो कई दिनों तक उसका मुंह ही नहीं देखा। पर जब धीरे धीरे हालत सुधरी सफलताएं मिलने लगीं तो माँ बेटी के भाग्य को श्रेय देने लगी उसको सराहने लगी.........पिता के दिल में भी कुछ संवेदनाएं जागने लगीं........पर अंहकार ज्यादा बलवान था...........जिस बेटी को सदा अपनी असफलताओं का कारण साबित किया उससे सदा दूरी ही बनाए रखी.........जाने किस बात का आक्रोश था जो बेटी से दो मीठे बोल भी न बोलने देता। सारा प्यार सालों छोटे भाई के हिस्से में आया। बहन के प्रति व्यवहार में पिता के विचारों की ही छवि रही.............भाई के प्रेम को भी तरसती रही।
फ़िर एक दिन एक सजीला द्वार पर आया..........रीति रिवाजों में बाँधकर अपने घर ले गया...............पहली बार पिता ने खालीपन महसूस किया..........पर देर हो चुकी थी.........अब तो वो परायी हो गयी थी...........भरे पूरे परिवार की बड़ी बहू बन ढेरों जिम्मेदारियों के बोझ तले फ़िर कभी मायके की लाडली बेटी बन कर न आ सकी...........जब भी आयी पीछे पीछे वापसी का बुलावा आजाता। एक दिन अचानक पिता का देहांत हो गया। मायके आयी तो माँ ने बताया कि उसके जाने के बाद पिता उसकी कमी महसूस करतेरहे..........अन्तिम समय में उसके प्रति अपने व्यवहार पर बहुत पछताए.................उसकी आँखें भर आयीं दिल ने कहा..............काश ऐसा पहले हो गया होता।
समय चक्र चलता रहा। माँ भी चली गई। भाई ने कभी मधुर सम्बन्ध रखे ही नहीं। मायके से रिश्ता बस रीति रिवाजों भर का रहा। पर जब पता चला भाई व्यापार में सब खो चुका है तो माँ से मिली सारी विरासत भाई को दे आयी.............विदेश जाकर एक नई शुरुआत करने को..............भाई ने पहली बार बहन को समझा...........पहली बार जाना कि वो माँ का ही प्रतिरूप है............दिल में प्यार जागा पर फ़िर से देर हो गई। भाई पर इस तरह धन लुटाने से पति नाराज हो गए..........मायके से सारे रिश्ते तुड़वा दिए............विदेश जाने से पहले भाई मिलने आया तो द्वार से ही लौटा दिया गया..........उसकी आँखें फ़िर भर आयीं........दिल ने फ़िर कहा काश ऐसा पहले हो गया होता। दिल पर पत्थर रख जीती रही औरों के लिए।
पति की नाराजगी जो शुरू हुई तो कभी ख़त्म न हो सकी। पत्नी की उपेक्षा कर काम में डूबे रहे............घर से ज्यादा समय बाहर बिताते........छोटी छोटी गलती पर भी उसे बुरी तरह लताड़ देते। इकलौता बेटा रईसी के अवगुणों से तो बचा रहा पर उसमें भी माँ के प्रति कभी सह्रदयता नहीं दिखी............एक अजीब सा परायापन पनपता रहा। शायद पिता के व्यवहार ने माँ के प्रति उसका नजरिया ही बदल दिया था.........वह विदेश चला गया। पीछे पति को जानलेवा बीमारी ने घेर लिया...........रोगशय्या पर कोई मित्र काम न आया। उसने जीजान से पति की सेवा करी............पति ने उस औरत में बसी अपनी पत्नी को बरसों बाद पहचाना.............पर पुनः देर हो गई...........संबंधों से सुंदर रूप लेना शुरू भी न किया था की म्रत्यु का देवता उसके पति को ले गया। जाते जाते पति ने उसके सर पर प्रेमपूर्वक हाथ रखा...........उसकी आँखें भर आयी दिल ने फ़िर कहा...........काश ऐसा पहले हो गया होता। पिता की म्रत्यु का समाचार सुन बेटा आया...........सभी रीति रिवाज पूरे किए पर माँ से कटा कटा ही रहा.............पिता के प्रति अपने सारे धर्म निभा कर वापस चला गया। माँ की पीड़ा को समझे बिना........बांटे बिना..........एक बार मुड़ कर भी नहीं देखा...........अपनी नई दुनिया बसा ली.........उसी में खो गया।
एक औरत की जीवटता कब तक साथ देती। आघातों पर अघात सहते सहते मन के साथ तन भी टूटने लगा। रोगों से घिर कर बिस्तर पकड़ लिया। बेटे को फुर्सत न मिली माँ के पास आने की.............शायद दिल ही न किया। अपने काम के सिलसिले में दूसरे देश जाते समय एअरपोर्ट पर मामा मिले। उनसे पता चला की माँ आखिरी साँसें ले रही है.............उसको देखने के लिए ही तरस रहीहै.............मामा से माँ की जीवन कथा सुनी तो बेटे की ऑंखें खुलीं............ .माँ का वो पहलू दिखा जिस पर उसकी उपेक्षा ने परदा डाल रखा था। तुंरत ही माँ से मिलने भागा.............जब पहुँचा तो माँ चिता के रथ पर सवार हो चुकी थी। बेटा सर थाम कर बैठ गया............आँखों से पछतावे के आँसू बह चले...............असहाय सा चिता की अग्नि को देखता रहा...............और उसकी आत्मा कराह रही थी कि काश ऐसा पहले हो गया होता।
वो औरत................एक व्यापारी के घर पैदा हुई...........कन्या रत्न की प्राप्ति घाटे में डूबे पिता के घर में...........जन्म से ही उपेक्षित रही। पिता ने तो कई दिनों तक उसका मुंह ही नहीं देखा। पर जब धीरे धीरे हालत सुधरी सफलताएं मिलने लगीं तो माँ बेटी के भाग्य को श्रेय देने लगी उसको सराहने लगी.........पिता के दिल में भी कुछ संवेदनाएं जागने लगीं........पर अंहकार ज्यादा बलवान था...........जिस बेटी को सदा अपनी असफलताओं का कारण साबित किया उससे सदा दूरी ही बनाए रखी.........जाने किस बात का आक्रोश था जो बेटी से दो मीठे बोल भी न बोलने देता। सारा प्यार सालों छोटे भाई के हिस्से में आया। बहन के प्रति व्यवहार में पिता के विचारों की ही छवि रही.............भाई के प्रेम को भी तरसती रही।
फ़िर एक दिन एक सजीला द्वार पर आया..........रीति रिवाजों में बाँधकर अपने घर ले गया...............पहली बार पिता ने खालीपन महसूस किया..........पर देर हो चुकी थी.........अब तो वो परायी हो गयी थी...........भरे पूरे परिवार की बड़ी बहू बन ढेरों जिम्मेदारियों के बोझ तले फ़िर कभी मायके की लाडली बेटी बन कर न आ सकी...........जब भी आयी पीछे पीछे वापसी का बुलावा आजाता। एक दिन अचानक पिता का देहांत हो गया। मायके आयी तो माँ ने बताया कि उसके जाने के बाद पिता उसकी कमी महसूस करतेरहे..........अन्तिम समय में उसके प्रति अपने व्यवहार पर बहुत पछताए.................उसकी आँखें भर आयीं दिल ने कहा..............काश ऐसा पहले हो गया होता।
समय चक्र चलता रहा। माँ भी चली गई। भाई ने कभी मधुर सम्बन्ध रखे ही नहीं। मायके से रिश्ता बस रीति रिवाजों भर का रहा। पर जब पता चला भाई व्यापार में सब खो चुका है तो माँ से मिली सारी विरासत भाई को दे आयी.............विदेश जाकर एक नई शुरुआत करने को..............भाई ने पहली बार बहन को समझा...........पहली बार जाना कि वो माँ का ही प्रतिरूप है............दिल में प्यार जागा पर फ़िर से देर हो गई। भाई पर इस तरह धन लुटाने से पति नाराज हो गए..........मायके से सारे रिश्ते तुड़वा दिए............विदेश जाने से पहले भाई मिलने आया तो द्वार से ही लौटा दिया गया..........उसकी आँखें फ़िर भर आयीं........दिल ने फ़िर कहा काश ऐसा पहले हो गया होता। दिल पर पत्थर रख जीती रही औरों के लिए।
पति की नाराजगी जो शुरू हुई तो कभी ख़त्म न हो सकी। पत्नी की उपेक्षा कर काम में डूबे रहे............घर से ज्यादा समय बाहर बिताते........छोटी छोटी गलती पर भी उसे बुरी तरह लताड़ देते। इकलौता बेटा रईसी के अवगुणों से तो बचा रहा पर उसमें भी माँ के प्रति कभी सह्रदयता नहीं दिखी............एक अजीब सा परायापन पनपता रहा। शायद पिता के व्यवहार ने माँ के प्रति उसका नजरिया ही बदल दिया था.........वह विदेश चला गया। पीछे पति को जानलेवा बीमारी ने घेर लिया...........रोगशय्या पर कोई मित्र काम न आया। उसने जीजान से पति की सेवा करी............पति ने उस औरत में बसी अपनी पत्नी को बरसों बाद पहचाना.............पर पुनः देर हो गई...........संबंधों से सुंदर रूप लेना शुरू भी न किया था की म्रत्यु का देवता उसके पति को ले गया। जाते जाते पति ने उसके सर पर प्रेमपूर्वक हाथ रखा...........उसकी आँखें भर आयी दिल ने फ़िर कहा...........काश ऐसा पहले हो गया होता। पिता की म्रत्यु का समाचार सुन बेटा आया...........सभी रीति रिवाज पूरे किए पर माँ से कटा कटा ही रहा.............पिता के प्रति अपने सारे धर्म निभा कर वापस चला गया। माँ की पीड़ा को समझे बिना........बांटे बिना..........एक बार मुड़ कर भी नहीं देखा...........अपनी नई दुनिया बसा ली.........उसी में खो गया।
एक औरत की जीवटता कब तक साथ देती। आघातों पर अघात सहते सहते मन के साथ तन भी टूटने लगा। रोगों से घिर कर बिस्तर पकड़ लिया। बेटे को फुर्सत न मिली माँ के पास आने की.............शायद दिल ही न किया। अपने काम के सिलसिले में दूसरे देश जाते समय एअरपोर्ट पर मामा मिले। उनसे पता चला की माँ आखिरी साँसें ले रही है.............उसको देखने के लिए ही तरस रहीहै.............मामा से माँ की जीवन कथा सुनी तो बेटे की ऑंखें खुलीं............ .माँ का वो पहलू दिखा जिस पर उसकी उपेक्षा ने परदा डाल रखा था। तुंरत ही माँ से मिलने भागा.............जब पहुँचा तो माँ चिता के रथ पर सवार हो चुकी थी। बेटा सर थाम कर बैठ गया............आँखों से पछतावे के आँसू बह चले...............असहाय सा चिता की अग्नि को देखता रहा...............और उसकी आत्मा कराह रही थी कि काश ऐसा पहले हो गया होता।
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