Friday, April 9, 2010

सोचती हूँ तुमसे किनारा कर लूं...........

सोचती हूँ तुमसे किनारा कर लूं..........क्यूँ इतना आश्चर्य क्यूँ...........चलो तुम्हारा आश्चर्य करना कुछ तो वाजिब है। वैसे भी तुम मेरे साथ थे ही कब??? जब साथ ही नहीं तो मुझे जाना ही कहाँ??
तुमको शायद याद भी न हो पर मेरे जेहन में तो वो पल आज भी वहीँ का वहीँ ठहरा हुआ है.......कितने साल होगए इस बात को शायद सोलह या सत्रह...........मैं हमेशा की तरह ख्यालों की दुनिया में गुम अपने आप में मस्त थी...........अपने काम में डूबी थी की पीछे से एक खनखनाती आवाज मुझसे टकराई.........मुड़ कर देखा तो वो तुम थे......पल भर को लगा कि मैं ये कहाँ आगई.......तुमने शायद मुझे देखा भी नहीं किसी और से उलझे रहे। मैंने भी तुमको ठीक से कहाँ देखा..........पर तुम्हारी वो बोलती आँखें और वो दबी दबी सी मुस्कान........कुछ तो असर कर गयी।
मुझे पता ही नहीं चला की मैं कब अपनी दुनिया से निकल कर एक नयी निराली दुनिया में आगई..........जहाँ हर पल मेरी नज़र तुम पर रहती हर सांस तुम्हारे शब्दों को सुनकर थम सी जाती..........पर मैं बावली जान ही न पायी की तुम कब चुपके से मेरे दिल में घर कर गए.........तब भी न जाना जब तुम दूर हो गए..........मैं फिर से अपने ख्यालों की दुनिया में गुम हो गयी पर इस बार तुम भी मेरे साथ थे......
कुछ महीने मेरे भीतर उथल पुथल मची रही...........कुछ खोया खोया सा लगता कुछ खाली कुछ रीता सा...........मैं खोजती ही रही की क्या है जो खो दिया और क्या है जो पा लिया........पर कुछ भी समझ नहीं आया.......इस एहसास का एहसास की तुम मुझे कुछ अपने से लगने लगे हो मुझे तब हुआ जब मैंने तुमको दोबारा देखा।
उस अलसाई सी सुबह तुम्हारी नींद भरी आँखे मेरी आँखों से मिली मैं सिहर कर रह गयी..........तुमने फिर से मुझे अनदेखा कर दिया, पर मैं उसके बाद कुछ भी देख न पाई.......मेरे भीतर कुछ एहसास पनपने की आहट ने उसदिन की तरह मेरे जीवन को भी बसंती कर दिया..............मैंने सोचा की अब जो मिले तो फिर न खोने दूँगी कम से कम तुम्हारे सामने खड़े हो कर यह तो कह ही दूँगी की मैं भी हूँ...............मेरे भीतर के वो कोमल एहसास डरते सकुचाते धीमे धीमे पग रखते तुम्हारी ओर बढ़ने ही लगे थे पर तुम जान भी न पाए और मैंने अपने हाथों से उनको मसल कर परे हटा दिया......नहीं पता था की तुमको देख कर अनजाने में जो एक साधारण सा जुमला मेरे मुह से निकला वो मेरे जीवन में इतना बड़ा तूफ़ान ला देगा.............तुम्हे याद नहीं वो मिठाई का दोना जो तुमने मेरी तरफ बढाया था उसे किसी ने यह कह कर परे हटा दिया कि मुझे पसंद नहीं............मुझसे सवाल किया गया की मेरे दिल में क्या है.........मैंने बेबाकी से कहा कुछ तो है क्या है यह पता नहीं...........मेरे सामने दो रास्ते रखे गए या तो मैं उनकी ख़ुशी कुर्बान कर दूं या फिर खुद कुर्बान हो जाऊं...........कहने वाले मेरे भी अपने थे और तुम्हारे भी.............पर तुम तो अपने भाई की बात पर कहकहे लगा रहे थे........तुमको मेरे दिल के टूटने की आवाज सुनाई भी न दी...........मैं कब वहां से उठ कर चली आई तुमको पता भी न चला.............
उस दिन मैं टूट कर बिखर गयी............अपने हाथों अपने दिल के इतने टुकड़े किये कि आज तक उन्हें कोई जोड़ न सका............काश तुमने उस समय मेरी ख़ामोशी सुनी होती.............काश तुमने मेरी आँखे देखी होती..........पर तुम्हारी तो पीठ थी मेरी तरफ तुमने तो मुझे जाते हुए भी न देखा............मैं तुम्हारी उस दुनिया से निकल आई जिसमें मेरे होने या न होने का एहसास तुमको कभी हुआ ही नहीं.............मैंने इश्वर को साक्षी मान कर कसम खायी अब तुम उसे मेरे सामने ले आओ तो ले आओ मैं तुम्हारी ओर कभी नज़र उठा कर नहीं देखूँगी.............
उसके बाद मैंने तुमको फिर कभी नहीं देखा.............कभी कोशिश भी नहीं की............तुमको भुलाने की बहुत कोशिश की एक हद तक भुला भी दिया...........पर मैं मैं न रही..........मेरे जीवन में फिर कोई बसंती रंग न आया..............किसी आवाज में वो खनखनाहट सुनाई नहीं दी............पर जिन्दगी कहाँ किसी के लिए रुकती है सो मेरे लिए भी नहीं ठहरी.................जीवन अपनी गति से चलता रहा........मेरे जीवन ने कई नए रंग देखे...........मुझमें कई एहसासों ने जन्म लिया..........कितने बरस बीत गए.........सब ठीक ठाक चल ही रहा था........अचानक...... एकदिन तुम मेरे सामने...........वही बोलती आँखे वही आवाज वही दबी दबी सी मुस्कान............तुमने पूछा पहचानना नहीं क्या? मैं अवाक् रह गयी........कुछ ठहर कर मैंने जवाब भी दिया की मैं तो समझती थी की आप मुझे नहीं पहचानते.........पर तुम मेरी बात का मतलब नहीं समझे...........समझते भी कैसे मैंने कभी तुमको कुछ पता ही ना चलने दिया।
अब जब फिर तुम मेरे सामने हो तो मैं बड़ी उलझन में हूँ...........जिन एहसासों को सालों पहले की एक बसंतपंचमी के दिन चौराहे की होली पर रख आई थी जिनको पूरनमासी की रात होलिका के साथ जला दिया था..........उसकी राख को भी आसुओं में घोल कर गरल बना कर पी गयी कि कोई उसे भी न देख सके...........वो तो मेरे कंठ से उतरी ही नहीं और जो उतरी तो दिल के किसी कोने में आज तक दबी रही...........अब उस राख से आंसू सूख गए हैं...........उसमें हलचल होने लगी है.........डरती हूँ की कोई चिंगारी कहीं फूट न जाए.................तब से और भी ज्यादा डर गयी हूँ जब बीती एक शाम मैंने तुम्हारे साथ वही मिठाई खा कर अपना व्रत तोड़ दिया................
तुमसे कटने लगी हूँ की कहीं तुम मुझको पढ़ न लो.............कहीं मेरा भेद जान न लो, जो मेरे इतने बरसों की तपस्या है..........आज मैं किसी के साए में खड़ी हूँ...............मेरे आँचल में किसी के भविष्य हैं............तुम्हारे हाथों की रेखाओं में भी तो तकदीर ने कई नाम जोड़ दिए हैं..............आज वो सब मेरे भी उतने ही अपने हैं जितने तुम्हारे........उस दिन मैंने वो विष इस लिए नहीं पिया था की आज उम्र के इस मोड़ पर जब सफेदी हमारे बालों से झलकने लगी है...............आज उसे उन्ही अपनों के गलों में उड़ेल दूं...............मेरी तपस्या भंग मत करना..........जैसे तुम अब तक अनजान थे वैसे ही अनजान बने रहना.......वरना वो तूफ़ान जो मैंने बरसों पहले रोका था अब आजायेगा..........इतने सालों के बाद उसे रोकने की ताकत मुझमें नहीं है........बड़ी मुश्किल से दिल को कतरा कतरा कर के जोड़ा है...............टूटने का दर्द जानती हूँ इसलिए किसी और के बिखरने का कारण नहीं बनना चाहती...........मेरे पास न आना मैं फिर से बिखर जाऊंगी।
शायद अब तक तुम मेरे दर्द की तहों तक जा कर उसपे लिखा अपना नाम पढ़ आए होगे............तुमने मुझे जान भी लिया होगा और पहचान भी लिया होगा..............कुछ एहसास तुम्हारे दिल में भी उठ रहेहोंगे............तुमको उन्ही का वास्ता........पहली पहली और आखिरी बार तुमसे कुछ मांगती हूँ.........अपनी इस विरहिणी को चिरविरहिनी ही बना रहने दो............इसी में सबकी भलाई है.........
.............इसीलिए सोचती हूँ तुमसे किनारा कर लूं................








(यह कहानी पूर्णतया काल्पनिक है जो रात के दो बजे मैंने लिखी है............वैसे आप सब इसे पढ़ कर अपने हिसाबसे समझनें और फिर सोचने के लिए स्वतंत्र हैं ........ :) )

Friday, March 19, 2010

शुक्रिया ......ऐ दोस्त !!!!!!

करीब दस महीनों के बाद आज अपने ब्लॉग पर कुछ लिख रही हूँ। इतने दिनों न लिखने के बहुत ढेर सारे कारण हैं, उनको फिर कभी बताउंगी पर अभी बताती हूँ कि मैं क्यों फिर लिख पा रही हूँ...............इतने दिनों लिखा तो नहीं पर बहुत कुछ पढ़ा और बहुतों को पढ़ा। उस बहुत कुछ और बहुतों में से कुछ ने मेरे अन्दर फिर से नए प्राणसंचार कर दिए हैं जो मेरा दिल फिर से सोचने पर मजबूर हो गया है। या यूँ कहें कि मैं दिल के हांथो मजबूर हो गयी हूँ। उसे सोचने से नहीं रोक सकती। विचारों कि बाढ़ सी आगयी है। दिल दिमाग में झंझावात से उठ रहे हैं। मन बहुत बेचैन है। समझ में नहीं आता कि शुरू कहाँ से करूं...................अब उस आरम्भ का आरम्भ हो ही गया है तो शुरू से ही शुरू करती हूँ। सबसे पहले तो उन दोस्तों का शुक्रिया जिनके कारण मैं आज फिर यहाँ हूँ। क्योंकि जो आपके में ऊर्जा का संचार करे, जो आपको भूली राह दिखाए, जो आपको आगे बढ़ने को प्रेरित करे वो आपके दोस्त के अलावा और कौन हो सकता है। अब वो कौन हैं इसे एक अबूझ पहेली ही बना रहने देती हूँ।

(कुछ पंक्तियाँ याद आरही हैं.... पता नहीं किसकी हैं )

शुक्रिया ऐ मेरी गैरत को जगाने वाले
मुझको मालूम नहीं था मैं अभी ज़िंदा हूँ।

Saturday, May 30, 2009

बुलबुला

बरसात हो रही है.........जमीन पर पड़ती बूँदें.........बनते बिगड़ते बुलबुले.........इन्ही बुलबुलों सी ही तो है जिन्दगी.......एक पल बनती अगले ही पल बिगड़ती पर इन दो पलों के बीच एक पूरी जिंदगी। कश्मकश.......होड़......आपाधापी......संघर्ष.......औपचारिकता, यही जिंदगी के पर्याय बन गए हैं। लड़का हो या लड़की.........पैदा होते ही जीने की जद्दोदहद.........चीख चीख कर सांस खींच कर जिंदगी की शुरुआत........माँ की उंगली का सहारा ले कर पहली बार खड़ा होना, वो पहला कदम........माँ बाप के साथ जिंदगी की इसी भगदड़ में शामिल हो जाता है। आज स्कूल में दाखिला........फ़िर खेल कूद में ईनाम.........गायन भी तो सीखना है........अरे ! क्रिकेट क्लास तो रह ही गई........थोड़ा सा ठहराव..........फ़िर नया संघर्ष...........नौकरी ढूँढने का, लग जाय तो उन्नति..........विदेश कैसे जाऊं..........हाय कहीं कोई मुझसे आगे न निकल जाय..........उसको पछाड़ दिया..........इसको पीछे छोड़ दिया..........बड़ी उपलब्धि........तब एक और नई जिंदगी साथ जुड़ जाती है इसी आपाधापी में वही भगदड़ वही मारामारी.......बच्चे हुए तो किस्सा शुरू से शुरू.........सारे रिश्ते नाते औपचारिकता भर रह गए। यहाँ तक की खुशियों के साथ भी औपचारिकता ही निभाते रहे। मनाया तो हर एक छोटी से छोटी खुशी का भी बड़ा सा जश्न, पर उसके पीछे भी कुछ जोड़तोड़........कहीं दिखावा........कभी होड़........कभी किसी की खुशामद.......कभी किसी पर एहसान। जिंदगी काट ली, जी नही.......पर हाय यह क्या !!!!!!!! सब थम गया........बुलबुला तो फूट गया........ढेरों नए बनते बिगड़ते हैं पर वो वाला कहाँ है ?????????? वो तो विलीन हो गया उसी अनंत में जहाँ से आया था।
फ़िर क्या मायने रखती है यह अंधी दौड़.........जहाँ आदमी आदमी के सर पर पाँव रख कर ऊपर बढ़ने में लगा है.........इन बनते बिगड़ते बुलबुलों को देख कर यही सोच रही हूँ। क्योंकि इन्ही में से एक बुलबुला मैं भी तो हूँ।

Thursday, April 23, 2009

कहानी..........बीज

उसका जन्म हो चुका था..........पर वो संसार के लिया अदृश्य था...........वो जीवन के अन्य रूप की परतों के भीतर छुपा था..........वो एक बीज था। एक विशाल वृक्ष के ढेरों फलों में से एक के भीतर छुपा..........जीवन का आरंभ..........एक बीज। सब कुछ अनोखा था उसके लिए, वो फल की सुरक्षा में प्रतिदिन बढ़ रहा था.........उसका जीवन प्रत्येक दिन के साथ विकसित हो रहा था।

जैसे हर जीव अपने भविष्य से अनजान है, उसे भी अपने आने वाले दिनों का कुछ ज्ञान न था। पर कुछ तो था जो बदल रहा था। बीज हैरान था..........जिस सरसता में वो जी रहा था वो हर दिन के साथ कम हो रहीथी........शुष्कता बढ़ती जा रही थी..........वो सिमटता जा रहा था..........समझ नहीं पा रहा था की क्या हो रहा है और क्या होने जा रहा है..........हर नए दिन के साथ आने वाले दिन की प्रतीक्षा करता रहा।

एक दिन वो हो गया जो उसने सोचा भी न था। फल वृक्ष से अलग हो गया..........गिरते समय शाख से टकराया और टूट गया.........बीज बाहर आगया........उसका आवरण , उसका कवच छूट गया..........हवा के वेग से वो इधर उधर उड़ने लगा.........घबरा गया, डर के मारे और भी सिकुड़ गया..........उसकी रंगत भी भय से पीली पड़ गई। हवा के आगे उसकी एक न चली, वो जहाँ चाहती उसे उड़ा ले जा रही थी, कभी दायें कभी बाएँ कभी ऊपर कभी नीचे..........फ़िर वो एक ही स्थान पर देर तक गोल गोल घूमता रहा..........हवा का वेग कम हुआ और बीज धरती पर गिर गया। वो इतना डर चुका था कि दम साधे पड़ा रहा..........अपनी आँखें भींचे.........अपना शरीर सिकोड़े..........धीरे धीरे उसपर मिट्टी कि परतें पड़ती गयीं..........वो अन्धकार के गर्त में दब सा गया..........एक निर्जीव की भांति जाने कब तक सोता रहा।

फ़िर आकाश में मेघ छाये..........जोर से बिजली कड़की.........मूसलाधार बरसात हुई..........पानी बरसा तो बरसता ही रहा...........पूरी धरती ही भीग गई...........पानी रिसता हुआ मिटटी की परतों को पार कर बीज तक जा पहुँचा। बीज उससे सराबोर हो गया.........उसमें ऊर्जा का संचार हुआ..........अपने अस्तित्व का अहसास हुआ..........धीरे से सर उठाया मिटटी कि परतों को धीरे से खिसका कर बाहर झाँका..............यह क्या!!!!!!!!! इतना उजाला.........सब कुछ धुला धुला............उसके भीतर हलचल होने लगी.........पुराने आवरण टूट गए............भीतर नए जीवन का आरम्भ होने लगा.............नयी कोपलें बाहर आ गयी..........धूप में नहा कर चटख हरा रंग ओढ़ लिया। चारों और देखा तो उसके जैसे ढेरों नए जीवन आकार ले रहे थे............उसका आत्मविश्वास और द्रढ़ होगया...........उसने अपनी जड़ों को और फैलाया, धरती को कस कर थाम लिया। अब वो बीज से एक पौधे में बदल चुका था।

ठंडी हवा का एक झोंका आया.......उसने लहरा कर अपने नए जीवन का स्वागत किया...........अब वो तैयार था.............अनेक रूपों और पड़ावों से होता हुआ कुछ नए बीजों को जन्म देने के लिए..............इस जीवन चक्र को दोहराने के लिए।


Saturday, April 18, 2009

कमाल की कला..........फ़ूड आर्ट!

मेरी किसी मित्र ने मुझे यह तस्वीरें मेल की हैं। आप भी देखिये। हैं न कमाल। पता नहीं इन्हें बनाने वाला कलाकार कौन है, पर वो बधाई का पात्र जरूर है।