सोचती हूँ तुमसे किनारा कर लूं..........क्यूँ इतना आश्चर्य क्यूँ...........चलो तुम्हारा आश्चर्य करना कुछ तो वाजिब है। वैसे भी तुम मेरे साथ थे ही कब??? जब साथ ही नहीं तो मुझे जाना ही कहाँ??
तुमको शायद याद भी न हो पर मेरे जेहन में तो वो पल आज भी वहीँ का वहीँ ठहरा हुआ है.......कितने साल होगए इस बात को शायद सोलह या सत्रह...........मैं हमेशा की तरह ख्यालों की दुनिया में गुम अपने आप में मस्त थी...........अपने काम में डूबी थी की पीछे से एक खनखनाती आवाज मुझसे टकराई.........मुड़ कर देखा तो वो तुम थे......पल भर को लगा कि मैं ये कहाँ आगई.......तुमने शायद मुझे देखा भी नहीं किसी और से उलझे रहे। मैंने भी तुमको ठीक से कहाँ देखा..........पर तुम्हारी वो बोलती आँखें और वो दबी दबी सी मुस्कान........कुछ तो असर कर गयी।
मुझे पता ही नहीं चला की मैं कब अपनी दुनिया से निकल कर एक नयी निराली दुनिया में आगई..........जहाँ हर पल मेरी नज़र तुम पर रहती हर सांस तुम्हारे शब्दों को सुनकर थम सी जाती..........पर मैं बावली जान ही न पायी की तुम कब चुपके से मेरे दिल में घर कर गए.........तब भी न जाना जब तुम दूर हो गए..........मैं फिर से अपने ख्यालों की दुनिया में गुम हो गयी पर इस बार तुम भी मेरे साथ थे......
कुछ महीने मेरे भीतर उथल पुथल मची रही...........कुछ खोया खोया सा लगता कुछ खाली कुछ रीता सा...........मैं खोजती ही रही की क्या है जो खो दिया और क्या है जो पा लिया........पर कुछ भी समझ नहीं आया.......इस एहसास का एहसास की तुम मुझे कुछ अपने से लगने लगे हो मुझे तब हुआ जब मैंने तुमको दोबारा देखा।
उस अलसाई सी सुबह तुम्हारी नींद भरी आँखे मेरी आँखों से मिली मैं सिहर कर रह गयी..........तुमने फिर से मुझे अनदेखा कर दिया, पर मैं उसके बाद कुछ भी देख न पाई.......मेरे भीतर कुछ एहसास पनपने की आहट ने उसदिन की तरह मेरे जीवन को भी बसंती कर दिया..............मैंने सोचा की अब जो मिले तो फिर न खोने दूँगी कम से कम तुम्हारे सामने खड़े हो कर यह तो कह ही दूँगी की मैं भी हूँ...............मेरे भीतर के वो कोमल एहसास डरते सकुचाते धीमे धीमे पग रखते तुम्हारी ओर बढ़ने ही लगे थे पर तुम जान भी न पाए और मैंने अपने हाथों से उनको मसल कर परे हटा दिया......नहीं पता था की तुमको देख कर अनजाने में जो एक साधारण सा जुमला मेरे मुह से निकला वो मेरे जीवन में इतना बड़ा तूफ़ान ला देगा.............तुम्हे याद नहीं वो मिठाई का दोना जो तुमने मेरी तरफ बढाया था उसे किसी ने यह कह कर परे हटा दिया कि मुझे पसंद नहीं............मुझसे सवाल किया गया की मेरे दिल में क्या है.........मैंने बेबाकी से कहा कुछ तो है क्या है यह पता नहीं...........मेरे सामने दो रास्ते रखे गए या तो मैं उनकी ख़ुशी कुर्बान कर दूं या फिर खुद कुर्बान हो जाऊं...........कहने वाले मेरे भी अपने थे और तुम्हारे भी.............पर तुम तो अपने भाई की बात पर कहकहे लगा रहे थे........तुमको मेरे दिल के टूटने की आवाज सुनाई भी न दी...........मैं कब वहां से उठ कर चली आई तुमको पता भी न चला.............
उस दिन मैं टूट कर बिखर गयी............अपने हाथों अपने दिल के इतने टुकड़े किये कि आज तक उन्हें कोई जोड़ न सका............काश तुमने उस समय मेरी ख़ामोशी सुनी होती.............काश तुमने मेरी आँखे देखी होती..........पर तुम्हारी तो पीठ थी मेरी तरफ तुमने तो मुझे जाते हुए भी न देखा............मैं तुम्हारी उस दुनिया से निकल आई जिसमें मेरे होने या न होने का एहसास तुमको कभी हुआ ही नहीं.............मैंने इश्वर को साक्षी मान कर कसम खायी अब तुम उसे मेरे सामने ले आओ तो ले आओ मैं तुम्हारी ओर कभी नज़र उठा कर नहीं देखूँगी.............
उसके बाद मैंने तुमको फिर कभी नहीं देखा.............कभी कोशिश भी नहीं की............तुमको भुलाने की बहुत कोशिश की एक हद तक भुला भी दिया...........पर मैं मैं न रही..........मेरे जीवन में फिर कोई बसंती रंग न आया..............किसी आवाज में वो खनखनाहट सुनाई नहीं दी............पर जिन्दगी कहाँ किसी के लिए रुकती है सो मेरे लिए भी नहीं ठहरी.................जीवन अपनी गति से चलता रहा........मेरे जीवन ने कई नए रंग देखे...........मुझमें कई एहसासों ने जन्म लिया..........कितने बरस बीत गए.........सब ठीक ठाक चल ही रहा था........अचानक...... एकदिन तुम मेरे सामने...........वही बोलती आँखे वही आवाज वही दबी दबी सी मुस्कान............तुमने पूछा पहचानना नहीं क्या? मैं अवाक् रह गयी........कुछ ठहर कर मैंने जवाब भी दिया की मैं तो समझती थी की आप मुझे नहीं पहचानते.........पर तुम मेरी बात का मतलब नहीं समझे...........समझते भी कैसे मैंने कभी तुमको कुछ पता ही ना चलने दिया।
अब जब फिर तुम मेरे सामने हो तो मैं बड़ी उलझन में हूँ...........जिन एहसासों को सालों पहले की एक बसंतपंचमी के दिन चौराहे की होली पर रख आई थी जिनको पूरनमासी की रात होलिका के साथ जला दिया था..........उसकी राख को भी आसुओं में घोल कर गरल बना कर पी गयी कि कोई उसे भी न देख सके...........वो तो मेरे कंठ से उतरी ही नहीं और जो उतरी तो दिल के किसी कोने में आज तक दबी रही...........अब उस राख से आंसू सूख गए हैं...........उसमें हलचल होने लगी है.........डरती हूँ की कोई चिंगारी कहीं फूट न जाए.................तब से और भी ज्यादा डर गयी हूँ जब बीती एक शाम मैंने तुम्हारे साथ वही मिठाई खा कर अपना व्रत तोड़ दिया................
तुमसे कटने लगी हूँ की कहीं तुम मुझको पढ़ न लो.............कहीं मेरा भेद जान न लो, जो मेरे इतने बरसों की तपस्या है..........आज मैं किसी के साए में खड़ी हूँ...............मेरे आँचल में किसी के भविष्य हैं............तुम्हारे हाथों की रेखाओं में भी तो तकदीर ने कई नाम जोड़ दिए हैं..............आज वो सब मेरे भी उतने ही अपने हैं जितने तुम्हारे........उस दिन मैंने वो विष इस लिए नहीं पिया था की आज उम्र के इस मोड़ पर जब सफेदी हमारे बालों से झलकने लगी है...............आज उसे उन्ही अपनों के गलों में उड़ेल दूं...............मेरी तपस्या भंग मत करना..........जैसे तुम अब तक अनजान थे वैसे ही अनजान बने रहना.......वरना वो तूफ़ान जो मैंने बरसों पहले रोका था अब आजायेगा..........इतने सालों के बाद उसे रोकने की ताकत मुझमें नहीं है........बड़ी मुश्किल से दिल को कतरा कतरा कर के जोड़ा है...............टूटने का दर्द जानती हूँ इसलिए किसी और के बिखरने का कारण नहीं बनना चाहती...........मेरे पास न आना मैं फिर से बिखर जाऊंगी।
शायद अब तक तुम मेरे दर्द की तहों तक जा कर उसपे लिखा अपना नाम पढ़ आए होगे............तुमने मुझे जान भी लिया होगा और पहचान भी लिया होगा..............कुछ एहसास तुम्हारे दिल में भी उठ रहेहोंगे............तुमको उन्ही का वास्ता........पहली पहली और आखिरी बार तुमसे कुछ मांगती हूँ.........अपनी इस विरहिणी को चिरविरहिनी ही बना रहने दो............इसी में सबकी भलाई है.........
.............इसीलिए सोचती हूँ तुमसे किनारा कर लूं................
(यह कहानी पूर्णतया काल्पनिक है जो रात के दो बजे मैंने लिखी है............वैसे आप सब इसे पढ़ कर अपने हिसाबसे समझनें और फिर सोचने के लिए स्वतंत्र हैं ........ :) )
तुमको शायद याद भी न हो पर मेरे जेहन में तो वो पल आज भी वहीँ का वहीँ ठहरा हुआ है.......कितने साल होगए इस बात को शायद सोलह या सत्रह...........मैं हमेशा की तरह ख्यालों की दुनिया में गुम अपने आप में मस्त थी...........अपने काम में डूबी थी की पीछे से एक खनखनाती आवाज मुझसे टकराई.........मुड़ कर देखा तो वो तुम थे......पल भर को लगा कि मैं ये कहाँ आगई.......तुमने शायद मुझे देखा भी नहीं किसी और से उलझे रहे। मैंने भी तुमको ठीक से कहाँ देखा..........पर तुम्हारी वो बोलती आँखें और वो दबी दबी सी मुस्कान........कुछ तो असर कर गयी।
मुझे पता ही नहीं चला की मैं कब अपनी दुनिया से निकल कर एक नयी निराली दुनिया में आगई..........जहाँ हर पल मेरी नज़र तुम पर रहती हर सांस तुम्हारे शब्दों को सुनकर थम सी जाती..........पर मैं बावली जान ही न पायी की तुम कब चुपके से मेरे दिल में घर कर गए.........तब भी न जाना जब तुम दूर हो गए..........मैं फिर से अपने ख्यालों की दुनिया में गुम हो गयी पर इस बार तुम भी मेरे साथ थे......
कुछ महीने मेरे भीतर उथल पुथल मची रही...........कुछ खोया खोया सा लगता कुछ खाली कुछ रीता सा...........मैं खोजती ही रही की क्या है जो खो दिया और क्या है जो पा लिया........पर कुछ भी समझ नहीं आया.......इस एहसास का एहसास की तुम मुझे कुछ अपने से लगने लगे हो मुझे तब हुआ जब मैंने तुमको दोबारा देखा।
उस अलसाई सी सुबह तुम्हारी नींद भरी आँखे मेरी आँखों से मिली मैं सिहर कर रह गयी..........तुमने फिर से मुझे अनदेखा कर दिया, पर मैं उसके बाद कुछ भी देख न पाई.......मेरे भीतर कुछ एहसास पनपने की आहट ने उसदिन की तरह मेरे जीवन को भी बसंती कर दिया..............मैंने सोचा की अब जो मिले तो फिर न खोने दूँगी कम से कम तुम्हारे सामने खड़े हो कर यह तो कह ही दूँगी की मैं भी हूँ...............मेरे भीतर के वो कोमल एहसास डरते सकुचाते धीमे धीमे पग रखते तुम्हारी ओर बढ़ने ही लगे थे पर तुम जान भी न पाए और मैंने अपने हाथों से उनको मसल कर परे हटा दिया......नहीं पता था की तुमको देख कर अनजाने में जो एक साधारण सा जुमला मेरे मुह से निकला वो मेरे जीवन में इतना बड़ा तूफ़ान ला देगा.............तुम्हे याद नहीं वो मिठाई का दोना जो तुमने मेरी तरफ बढाया था उसे किसी ने यह कह कर परे हटा दिया कि मुझे पसंद नहीं............मुझसे सवाल किया गया की मेरे दिल में क्या है.........मैंने बेबाकी से कहा कुछ तो है क्या है यह पता नहीं...........मेरे सामने दो रास्ते रखे गए या तो मैं उनकी ख़ुशी कुर्बान कर दूं या फिर खुद कुर्बान हो जाऊं...........कहने वाले मेरे भी अपने थे और तुम्हारे भी.............पर तुम तो अपने भाई की बात पर कहकहे लगा रहे थे........तुमको मेरे दिल के टूटने की आवाज सुनाई भी न दी...........मैं कब वहां से उठ कर चली आई तुमको पता भी न चला.............
उस दिन मैं टूट कर बिखर गयी............अपने हाथों अपने दिल के इतने टुकड़े किये कि आज तक उन्हें कोई जोड़ न सका............काश तुमने उस समय मेरी ख़ामोशी सुनी होती.............काश तुमने मेरी आँखे देखी होती..........पर तुम्हारी तो पीठ थी मेरी तरफ तुमने तो मुझे जाते हुए भी न देखा............मैं तुम्हारी उस दुनिया से निकल आई जिसमें मेरे होने या न होने का एहसास तुमको कभी हुआ ही नहीं.............मैंने इश्वर को साक्षी मान कर कसम खायी अब तुम उसे मेरे सामने ले आओ तो ले आओ मैं तुम्हारी ओर कभी नज़र उठा कर नहीं देखूँगी.............
उसके बाद मैंने तुमको फिर कभी नहीं देखा.............कभी कोशिश भी नहीं की............तुमको भुलाने की बहुत कोशिश की एक हद तक भुला भी दिया...........पर मैं मैं न रही..........मेरे जीवन में फिर कोई बसंती रंग न आया..............किसी आवाज में वो खनखनाहट सुनाई नहीं दी............पर जिन्दगी कहाँ किसी के लिए रुकती है सो मेरे लिए भी नहीं ठहरी.................जीवन अपनी गति से चलता रहा........मेरे जीवन ने कई नए रंग देखे...........मुझमें कई एहसासों ने जन्म लिया..........कितने बरस बीत गए.........सब ठीक ठाक चल ही रहा था........अचानक...... एकदिन तुम मेरे सामने...........वही बोलती आँखे वही आवाज वही दबी दबी सी मुस्कान............तुमने पूछा पहचानना नहीं क्या? मैं अवाक् रह गयी........कुछ ठहर कर मैंने जवाब भी दिया की मैं तो समझती थी की आप मुझे नहीं पहचानते.........पर तुम मेरी बात का मतलब नहीं समझे...........समझते भी कैसे मैंने कभी तुमको कुछ पता ही ना चलने दिया।
अब जब फिर तुम मेरे सामने हो तो मैं बड़ी उलझन में हूँ...........जिन एहसासों को सालों पहले की एक बसंतपंचमी के दिन चौराहे की होली पर रख आई थी जिनको पूरनमासी की रात होलिका के साथ जला दिया था..........उसकी राख को भी आसुओं में घोल कर गरल बना कर पी गयी कि कोई उसे भी न देख सके...........वो तो मेरे कंठ से उतरी ही नहीं और जो उतरी तो दिल के किसी कोने में आज तक दबी रही...........अब उस राख से आंसू सूख गए हैं...........उसमें हलचल होने लगी है.........डरती हूँ की कोई चिंगारी कहीं फूट न जाए.................तब से और भी ज्यादा डर गयी हूँ जब बीती एक शाम मैंने तुम्हारे साथ वही मिठाई खा कर अपना व्रत तोड़ दिया................
तुमसे कटने लगी हूँ की कहीं तुम मुझको पढ़ न लो.............कहीं मेरा भेद जान न लो, जो मेरे इतने बरसों की तपस्या है..........आज मैं किसी के साए में खड़ी हूँ...............मेरे आँचल में किसी के भविष्य हैं............तुम्हारे हाथों की रेखाओं में भी तो तकदीर ने कई नाम जोड़ दिए हैं..............आज वो सब मेरे भी उतने ही अपने हैं जितने तुम्हारे........उस दिन मैंने वो विष इस लिए नहीं पिया था की आज उम्र के इस मोड़ पर जब सफेदी हमारे बालों से झलकने लगी है...............आज उसे उन्ही अपनों के गलों में उड़ेल दूं...............मेरी तपस्या भंग मत करना..........जैसे तुम अब तक अनजान थे वैसे ही अनजान बने रहना.......वरना वो तूफ़ान जो मैंने बरसों पहले रोका था अब आजायेगा..........इतने सालों के बाद उसे रोकने की ताकत मुझमें नहीं है........बड़ी मुश्किल से दिल को कतरा कतरा कर के जोड़ा है...............टूटने का दर्द जानती हूँ इसलिए किसी और के बिखरने का कारण नहीं बनना चाहती...........मेरे पास न आना मैं फिर से बिखर जाऊंगी।
शायद अब तक तुम मेरे दर्द की तहों तक जा कर उसपे लिखा अपना नाम पढ़ आए होगे............तुमने मुझे जान भी लिया होगा और पहचान भी लिया होगा..............कुछ एहसास तुम्हारे दिल में भी उठ रहेहोंगे............तुमको उन्ही का वास्ता........पहली पहली और आखिरी बार तुमसे कुछ मांगती हूँ.........अपनी इस विरहिणी को चिरविरहिनी ही बना रहने दो............इसी में सबकी भलाई है.........
.............इसीलिए सोचती हूँ तुमसे किनारा कर लूं................
(यह कहानी पूर्णतया काल्पनिक है जो रात के दो बजे मैंने लिखी है............वैसे आप सब इसे पढ़ कर अपने हिसाबसे समझनें और फिर सोचने के लिए स्वतंत्र हैं ........ :) )












