Friday, April 23, 2010

थोड़ा सा जी लेने दे..........

बड़ी घुटन सी हो रही है.........मैं सांस भी नहीं ले पा रही हूँ........जिंदगी ने तहज़ीब, रस्मों रवायतों और फर्ज के इतने लबादे मेरे ऊपर लपेट दिए हैं कि मैं उनके बोझ तले दबी जा रही हूँ........मैं भूलती जा रही हूँ कि मैं कौन हूँ क्या हूँ, सारा दर्द दिल में जमता जा रहा है..........देखने वालों को लगता है कि ऐसा भी क्या हो गया है जो यह हमेशा दर्द की ही बातें करती है..........उनकी गलती नहीं..........किसी के दिल में झाँक कर उस की गहराइयों तक पहुँच पाना, छुपे हुए एहसासों के दरवाजे खोल पाना आसान काम नहीं है...........वो भी तब जब उस पर दिखावे के तबस्सुम के तालें जड़े हों.......
समझ में नहीं आता!! तू मेरी ही जिंदगी है ........सिर्फ मेरी........फिर भी मेरा तुझ पर कोई इख्तियार नहीं.....क्या फर्क है तुझमें और दुनिया वालों में......... वो मुझसे पूछते हैं कि मैं क्या चाहती हूँ........... तू कभी यह देखती है कि मैं किन उम्मीदों के साथ तेरी तरफ देख रही हूँ............या तू सब समझ कर भी अनदेखा कर देती है..........मानाकि तुझे उस ऊपरवाले ने बनाया है............तेरे वज़ूद का एक एक लम्हा खुदा ने खुद अपने हाथों मेरी तकदीर की कलम से लिखा है........जिसे उसके आलावा कोई भी बदल नहीं सकता......तू भी नहीं........पर तू मेरे लिए उससे एक गुजारिश तो कर ही सकती है........कर सकती है ??????
मैंने तो अपनी तरफ से हमेशा तुझे सवाँरकर सलीके से रखने की कोशिश की है......अब तक तुझसे कुछ भी नहीं माँगा..........क्या तू मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकती ? मेरी ओर से उससे एक बार इतनी इल्तजा कर के तो देख, शायद वो मान ही ले......मुझे बस कुछ पल दे दे............ज्य़ादा की हसरत नहीं है...........कुछ छोटी छोटी तमन्नाएँ जग गयी हैं........बस कुछ पल चैन की सांस ले लूं........कुछ पल आँख बंद करूं और मेरे दिल की तड़प को थोड़ा सा सुकून आजाये...........बस दो चार धडकनें थम थम के आहिस्ता से आजाये..........इन्तजार से थकी बोझिल नज़रों में वस्लेयार से थोड़ी सी चमक आजाये...........कई दिनों से जागती हुई रातों में कुछ पल के लिए नींद आजाये........बस इतना ही......मेरी ख्वाहिशें ज्यादा ऊंची नहीं हैं कि तू चाहे और पूरा ही कर पाए............बस कुछ देर के लिए रस्मों रवायतों का वास्ता दे.........फर्ज की बेड़ियाँ पहना.........कुछ देर के लिए इनके लबादे उतार लेनेदे.......... मेरी जिन्दगी इतना तो करेगी मेरे लिए.........बस इतना.........तेरी कसम फिर कुछ मांगूगी....कुछ चाहूंगी
बस कुछ देर जीना चाहती हूँ..........थोड़ा सा जी लेने दे।

Sunday, April 18, 2010

मॉम यू आर टू गुड..............;;




शीर्षक से ही समझ गए होंगे कि मैं बच्चों की बात कर रही हूँ। जी सही समझा। कल मैं अपने कम्प्यूटर पर कुछ टाइप कर रही थी...........पता ही नही चला कि मेरे बेटे मेरे पीछे खड़े बहुत ध्यान से देख रहे हैं। ऐसा आम तौर पर होता नहीं है क्योंकि कुछ मिनट तो क्या कुछ पल भी वो शांत नहीं रह सकते। इसलिए आप एक ही जगह बैठे बैठे पता लगा सकते हैं कि वो घर के किस कोने में हैं............और अगर वो घर में हैं साथ ही कोई शोर नहीं है तो मतलब कि कहीं कुछ गड़बड़ है.........कहीं कुछ खुराफात चल रही है.............ऐसे वो दोनों आपको हमेशा सोफे की बैक पर, कुर्सी के नीचे, अपने बंक बेड पर उलटी तरफ से चढ़ते, कार से दरवाजे की जगह खिड़की से बाहर आते ...............या इसी तरह की गतिविधियों के साथ मिलेंगे............अनगिनत है गिनाने बैठी तो जाने यह पोस्ट कभी पूरी ही न हो पाए। हाँ तो अब मुख्य बात पर आती हूँ...........मैं कुछ टाइप कर रही थी और अचानक दोनों मेरे पीछे से आकर मुझ से लिपट गए...........एक स्वर में बोले मम्मी य़ू आर टू गुड...........फिर ढेर सारी फ़्लाइंग किस मेरी और उछाल दी मैं भौचक्क उनको देखती रही ..........मेरी समझ में ही नहीं आ रहा था कि अचानक ऐसा क्या हो गया जो मेरे बेटे अपनी माँ पर इतना रीझ रहे हैं...............मैंने पूछा हुआ क्या.........तो बोले मम्मी तुम तो हमारी मैम से भी ज्यादा इन्टैलिजेंट हो, मैंने पूछा कि भला वो कैसे......तो वो बोले मम्मी हमारी मैम तो कंप्यूटर में केवल A B C D ही लिख पाती हैं पर तुम तो A B C D के बटन से क ख ग घ भी लिख लेती हो ...........रीयली मम्मी यू आर टू गुड........ बच्चों के इस भोलेपन पर मैं मुग्ध हो गयी.............
अपने बच्चों के साथ इनके बचपन का एक एक पल जीने और उसको सहेज कर रखने की कोशिश करती हूँ कुछ यादों में, कुछ डायरी और कुछ फोटों में ......जाने कल वक़्त और जिंदगी उन्हें कहाँ ले जाए ..........पर उनका यह बचपन सदा सदा मेरे मन में ताज़ा रहेगा। मेरे नन्हों की कुछ कारगुजारियां.............

बंक बेड पर चढ़ कर छत पर की गयी चित्रकारी..


नयी कार पर पत्थर से खुरच कर की गयी कारीगरी॥




मेरे बीमार पड़ने पर बनाया हुआ Get well soon कार्ड





Friday, April 9, 2010

सोचती हूँ तुमसे किनारा कर लूं...........

सोचती हूँ तुमसे किनारा कर लूं..........क्यूँ इतना आश्चर्य क्यूँ...........चलो तुम्हारा आश्चर्य करना कुछ तो वाजिब हैवैसे भी तुम मेरे साथ थे ही कब??? जब साथ ही नहीं तो मुझे जाना ही कहाँ??
तुमको शायद याद भी हो पर मेरे जेहन में तो वो पल आज भी वहीँ का वहीँ ठहरा हुआ है.......कितने साल होगए इस बात को शायद सोलह या सत्रह...........मैं हमेशा की तरह ख्यालों की दुनिया में गुम अपने आप में मस्त थी...........अपने काम में डूबी थी की पीछे से एक खनखनाती आवाज मुझसे टकराई.........मुड़ कर देखा तो वो तुम थे......पल भर को लगा कि मैं ये कहाँ आगई.......तुमने शायद मुझे देखा भी नहीं किसी और से उलझे रहेमैंने भी तुमको ठीक से कहाँ देखा..........पर तुम्हारी वो बोलती आँखें और वो दबी दबी सी मुस्कान........कुछ तो असर कर गयी
मुझे पता ही नहीं चला की मैं कब अपनी दुनिया से निकल कर एक नयी निराली दुनिया में आगई..........जहाँ हर पल मेरी नज़र तुम पर रहती हर सांस तुम्हारे शब्दों को सुनकर थम सी जाती..........पर मैं बावली जान ही पायी की तुम कब चुपके से मेरे दिल में घर कर गए.........तब भी जाना जब तुम दूर हो गए..........मैं फिर से अपने ख्यालों की दुनिया में गुम हो गयी पर इस बार तुम भी मेरे साथ थे......
कुछ महीने मेरे भीतर उथल पुथल मची रही...........कुछ खोया खोया सा लगता कुछ खाली कुछ रीता सा...........मैं खोजती ही रही की क्या है जो खो दिया और क्या है जो पा लिया........पर कुछ भी समझ नहीं आया.......इस एहसास का एहसास की तुम मुझे कुछ अपने से लगने लगे हो मुझे तब हुआ जब मैंने तुमको दोबारा देखा
उस अलसाई सी सुबह तुम्हारी नींद भरी आँखे मेरी आँखों से मिली मैं सिहर कर रह गयी..........तुमने फिर से मुझे अनदेखा कर दिया, पर मैं उसके बाद कुछ भी देख पाई.......मेरे भीतर कुछ एहसास पनपने की आहट ने उसदिन की तरह मेरे जीवन को भी बसंती कर दिया..............मैंने सोचा की अब जो मिले तो फिर खोने दूँगी कम से कम तुम्हारे सामने खड़े हो कर यह तो कह ही दूँगी की मैं भी हूँ...............मेरे भीतर के वो कोमल एहसास डरते सकुचाते धीमे धीमे पग रखते तुम्हारी ओर बढ़ने ही लगे थे पर तुम जान भी पाए और मैंने अपने हाथों से उनको मसल कर परे हटा दिया......नहीं पता था की तुमको देख कर अनजाने में जो एक साधारण सा जुमला मेरे मुह से निकला वो मेरे जीवन में इतना बड़ा तूफ़ान ला देगा.............तुम्हे याद नहीं वो मिठाई का दोना जो तुमने मेरी तरफ बढाया था उसे किसी ने यह कह कर परे हटा दिया कि मुझे पसंद नहीं............मुझसे सवाल किया गया की मेरे दिल में क्या है.........मैंने बेबाकी से कहा कुछ तो है क्या है यह पता नहीं...........मेरे सामने दो रास्ते रखे गए या तो मैं उनकी ख़ुशी कुर्बान कर दूं या फिर खुद कुर्बान हो जाऊं...........कहने वाले मेरे भी अपने थे और तुम्हारे भी.............पर तुम तो अपने भाई की बात पर कहकहे लगा रहे थे........तुमको मेरे दिल के टूटने की आवाज सुनाई भी दी...........मैं कब वहां से उठ कर चली आई तुमको पता भी चला.............
उस दिन मैं टूट कर बिखर गयी............अपने हाथों अपने दिल के इतने टुकड़े किये कि आज तक उन्हें कोई जोड़ सका............काश तुमने उस समय मेरी ख़ामोशी सुनी होती.............काश तुमने मेरी आँखे देखी होती..........पर तुम्हारी तो पीठ थी मेरी तरफ तुमने तो मुझे जाते हुए भी देखा............मैं तुम्हारी उस दुनिया से निकल आई जिसमें मेरे होने या होने का एहसास तुमको कभी हुआ ही नहीं.............मैंने इश्वर को साक्षी मान कर कसम खायी अब तुम उसे मेरे सामने ले आओ तो ले आओ मैं तुम्हारी ओर कभी नज़र उठा कर नहीं देखूँगी.............
उसके बाद मैंने तुमको फिर कभी नहीं देखा.............कभी कोशिश भी नहीं की............तुमको भुलाने की बहुत कोशिश की एक हद तक भुला भी दिया...........पर मैं मैं रही..........मेरे जीवन में फिर कोई बसंती रंग आया..............किसी आवाज में वो खनखनाहट सुनाई नहीं दी............पर जिन्दगी कहाँ किसी के लिए रुकती है सो मेरे लिए भी नहीं ठहरी.................जीवन अपनी गति से चलता रहा........मेरे जीवन ने कई नए रंग देखे...........मुझमें कई एहसासों ने जन्म लिया..........कितने बरस बीत गए.........सब ठीक ठाक चल ही रहा था........अचानक...... एकदिन तुम मेरे सामने...........वही बोलती आँखे वही आवाज वही दबी दबी सी मुस्कान............तुमने पूछा पहचानना नहीं क्या? मैं अवाक् रह गयी........कुछ ठहर कर मैंने जवाब भी दिया की मैं तो समझती थी की आप मुझे नहीं पहचानते.........पर तुम मेरी बात का मतलब नहीं समझे...........समझते भी कैसे मैंने कभी तुमको कुछ पता ही ना चलने दिया
अब जब फिर तुम मेरे सामने हो तो मैं बड़ी उलझन में हूँ...........जिन एहसासों को सालों पहले की एक बसंतपंचमी के दिन चौराहे की होली पर रख आई थी जिनको पूरनमासी की रात होलिका के साथ जला दिया था..........उसकी राख को भी आसुओं में घोल कर गरल बना कर पी गयी कि कोई उसे भी देख सके...........वो तो मेरे कंठ से उतरी ही नहीं और जो उतरी तो दिल के किसी कोने में आज तक दबी रही...........अब उस राख से आंसू सूख गए हैं...........उसमें हलचल होने लगी है.........डरती हूँ की कोई चिंगारी कहीं फूट जाए.................तब से और भी ज्यादा डर गयी हूँ जब बीती एक शाम मैंने तुम्हारे साथ वही मिठाई खा कर अपना व्रत तोड़ दिया................
तुमसे कटने लगी हूँ की कहीं तुम मुझको पढ़ लो.............कहीं मेरा भेद जान लो, जो मेरे इतने बरसों की तपस्या है..........आज मैं किसी के साए में खड़ी हूँ...............मेरे आँचल में किसी के भविष्य हैं............तुम्हारे हाथों की रेखाओं में भी तो तकदीर ने कई नाम जोड़ दिए हैं..............आज वो सब मेरे भी उतने ही अपने हैं जितने तुम्हारे........उस दिन मैंने वो विष इस लिए नहीं पिया था की आज उम्र के इस मोड़ पर जब सफेदी हमारे बालों से झलकने लगी है...............आज उसे उन्ही अपनों के गलों में उड़ेल दूं...............मेरी तपस्या भंग मत करना..........जैसे तुम अब तक अनजान थे वैसे ही अनजान बने रहना.......वरना वो तूफ़ान जो मैंने बरसों पहले रोका था अब आजायेगा..........इतने सालों के बाद उसे रोकने की ताकत मुझमें नहीं है........बड़ी मुश्किल से दिल को कतरा कतरा कर के जोड़ा है...............टूटने का दर्द जानती हूँ इसलिए किसी और के बिखरने का कारण नहीं बनना चाहती...........मेरे पास आना मैं फिर से बिखर जाऊंगी
शायद अब तक तुम मेरे दर्द की तहों तक जा कर उसपे लिखा अपना नाम पढ़ आए होगे............तुमने मुझे जान भी लिया होगा और पहचान भी लिया होगा..............कुछ एहसास तुम्हारे दिल में भी उठ रहेहोंगे............तुमको उन्ही का वास्ता........पहली पहली और आखिरी बार तुमसे कुछ मांगती हूँ.........अपनी इस विरहिणी को चिरविरहिनी ही बना रहने दो............इसी में सबकी भलाई है.........
.............इसीलिए सोचती हूँ तुमसे किनारा कर लूं................








(यह कहानी पूर्णतया काल्पनिक है जो रात के दो बजे मैंने लिखी है............वैसे आप सब इसे पढ़ कर अपने हिसाबसे समझनें और फिर सोचने के लिए स्वतंत्र हैं ........ :) )

Friday, March 19, 2010

शुक्रिया ......ऐ दोस्त !!!!!!

करीब दस महीनों के बाद आज अपने ब्लॉग पर कुछ लिख रही हूँइतने दिनों लिखने के बहुत ढेर सारे कारण हैं, उनको फिर कभी बताउंगी पर अभी बताती हूँ कि मैं क्यों फिर लिख पा रही हूँ...............इतने दिनों लिखा तो नहीं पर बहुत कुछ पढ़ा और बहुतों को पढ़ाउस बहुत कुछ और बहुतों में से कुछ ने मेरे अन्दर फिर से नए प्राणसंचार कर दिए हैं जो मेरा दिल फिर से सोचने पर मजबूर हो गया हैया यूँ कहें कि मैं दिल के हांथो मजबूर हो गयी हूँउसे सोचने से नहीं रोक सकतीविचारों कि बाढ़ सी आगयी हैदिल दिमाग में झंझावात से उठ रहे हैंमन बहुत बेचैन हैसमझ में नहीं आता कि शुरू कहाँ से करूं...................अब उस आरम्भ का आरम्भ हो ही गया है तो शुरू से ही शुरू करती हूँसबसे पहले तो उन दोस्तों का शुक्रिया जिनके कारण मैं आज फिर यहाँ हूँक्योंकि जो आपके में ऊर्जा का संचार करे, जो आपको भूली राह दिखाए, जो आपको आगे बढ़ने को प्रेरित करे वो आपके दोस्त के अलावा और कौन हो सकता हैअब वो कौन हैं इसे एक अबूझ पहेली ही बना रहने देती हूँ

(कुछ पंक्तियाँ याद आरही हैं.... पता नहीं किसकी हैं )

शुक्रियामेरी गैरत को जगाने वाले
मुझको मालूम नहीं था मैं अभी ज़िंदा हूँ

Saturday, May 30, 2009

बुलबुला

बरसात हो रही है.........जमीन पर पड़ती बूँदें.........बनते बिगड़ते बुलबुले.........इन्ही बुलबुलों सी ही तो है जिन्दगी.......एक पल बनती अगले ही पल बिगड़ती पर इन दो पलों के बीच एक पूरी जिंदगी। कश्मकश.......होड़......आपाधापी......संघर्ष.......औपचारिकता, यही जिंदगी के पर्याय बन गए हैं। लड़का हो या लड़की.........पैदा होते ही जीने की जद्दोदहद.........चीख चीख कर सांस खींच कर जिंदगी की शुरुआत........माँ की उंगली का सहारा ले कर पहली बार खड़ा होना, वो पहला कदम........माँ बाप के साथ जिंदगी की इसी भगदड़ में शामिल हो जाता है। आज स्कूल में दाखिला........फ़िर खेल कूद में ईनाम.........गायन भी तो सीखना है........अरे ! क्रिकेट क्लास तो रह ही गई........थोड़ा सा ठहराव..........फ़िर नया संघर्ष...........नौकरी ढूँढने का, लग जाय तो उन्नति..........विदेश कैसे जाऊं..........हाय कहीं कोई मुझसे आगे निकल जाय..........उसको पछाड़ दिया..........इसको पीछे छोड़ दिया..........बड़ी उपलब्धि........तब एक और नई जिंदगी साथ जुड़ जाती है इसी आपाधापी में वही भगदड़ वही मारामारी.......बच्चे हुए तो किस्सा शुरू से शुरू.........सारे रिश्ते नाते औपचारिकता भर रह गए। यहाँ तक की खुशियों के साथ भी औपचारिकता ही निभाते रहे। मनाया तो हर एक छोटी से छोटी खुशी का भी बड़ा सा जश्न, पर उसके पीछे भी कुछ जोड़तोड़........कहीं दिखावा........कभी होड़........कभी किसी की खुशामद.......कभी किसी पर एहसान। जिंदगी काट ली, जी नही.......पर हाय यह क्या !!!!!!!! सब थम गया........बुलबुला तो फूट गया........ढेरों नए बनते बिगड़ते हैं पर वो वाला कहाँ है ?????????? वो तो विलीन हो गया उसी अनंत में जहाँ से आया था।
फ़िर क्या मायने रखती है यह अंधी दौड़.........जहाँ आदमी आदमी के सर पर पाँव रख कर ऊपर बढ़ने में लगा है.........इन बनते बिगड़ते बुलबुलों को देख कर यही सोच रही हूँ। क्योंकि इन्ही में से एक बुलबुला मैं भी तो हूँ।