Saturday, April 24, 2010

तुमसे जलती हूँ मैं.............खुद पर इतराती भी हूँ !!!!!!

पता है मैं तुमसे जलती हूँ ..........सोचते होगे कि क्यूँ भला, मैं तुमसे क्यूँ जलने लगी.........बताऊँ ???? उस दिन जब मैंने तुमसे पूछा था कि क्या तुमको कभी इस बात की खुशी नहीं होती की कोई इस दुनिया में ऐसा है जो तुमसे बहुत प्यार करता है...........कोई दिल है जो सिर्फ तुम्हारे लिए ही धड़कता है....क्या तुम्हे इस बात पर झूमने का मन नहीं करता की कोई तुम्हारा दीवाना है.........मुझे याद है तुमने कहा था........मैं सब सुनता हूँ और मेरी समझ में सब आता है........मुझे सब पता है..........पर मैं अपने पाँव जमीन पर रखता हूँ.............
सच में बड़ी जलन हुई मुझे तुमसे.......तुम ऐसा कैसे कह सकते हो उससे भी ज्यादा ऐसा कैसे कर लेते हो...............दिल में प्यार भरा हो और कोई प्यार भरा दिल आपके लिए धड़कता हो..........आप सब जानते भी हो फिर भी पाँव जमीन पर रखते की काबिलियत है तुममें. कितना फर्क है तुममें और मुझमें.........पता है........यह सोच कर मैं अपने पर इतराती भी हूँ............अब सोचते हो कि वो भला क्यूँ...........यूँ भी मुझे बंधन अच्छे नहीं लगते.........तुमनें देखा है उड़ती फिरती हूँ अपने ही ख्यालों में........मेरी दुनिया में आसमान की कोई हद नहीं है इसलिए मैं जितना ऊँचा उड़ना चाहूँ उड़ सकती हूँ.......अपने पंखो को जितना चाहूँ पसार सकती हूँ.............जहाँ चाहूँ जब चाहूँ जा सकती हूँ मुझे कोई नहीं रोक सकता.......कभी कभी तो अपने ही आप पर रीझ जाती हूँ कि जिसके लिए दिल की हर धड़कन है............जिसकी खुशबू से मेरी हर सांस महकती है............उसके दिल में भी मेरे लिए प्यार ही प्यार है......यह ख़याल ही मेरे पांवों को जमीन पर टिकने नहीं देता
यह मत समझना कि मुझे ज़मीन की जरूरत का एहसास नहीं है........मुझे पता है कि एक दिन मुझे भी इसी मिट्टी में मिल जाना है........इसीलिए मैंने इसका एक छोटा सा टुकड़ा अपने पांवों के बीच फंसा रखा है...........जो मुझे हमेशा याद दिलाता रहता है की यही वह जगह है जहाँ आखिरकार मुझको आराम मिलना है.........क्योंकि मेरी दुनिया में सब कुछ है बस सुकून ही नहीं है.........प्यार जो करती हूँ..........अब एक दिल में या तो प्यार रह सकता है या फिर सुकून.......अब जब यह दिल प्यार से भरा है तो सुकून कहाँ से लाऊँ???
सच है मैं तुम्हारी तरह नहीं सोच सकती..............मैं व्यवहारिकता में अभी भी कच्ची हूँ..........पर तुम्हारी जिन्दगी का फलसफा जो मैंने देखा है और सुना है............उससे मैंने भी कुछ सीखा है......शायद तुम ठीक ही कहते हो
तुम मुझे जो भी समझाते हो........मैं हर बात बड़े ध्यान से सुनती हूँ..........समझने की कोशिश भी करती हूँ.........अक्सर तुम्हारी और मेरी सोच मेल नहीं खाती..........पर अगर तुम कहते हो तो वो सही ही होगा। इसीलिए मैंने अपने दिल की एक डोर तुम्हारे पांवों तले की जमीन से बाँध दी है...........जब मैं उड़ते उड़ते थक जाऊं..........भटकते भटकते गुम हो जाऊं जब मेरी रूह को सुकून की जरूरत हो तब तुम्हारे नेह की यही डोर मुझे तुम तक ले आये..........क्योंकि जब एक दिन इस जमीन पर आना है तो क्यूँ जमीन के उसी हिस्से में आके मिल जाऊं जहाँ तुम्हारे पाँव पड़ते हैं............मेरी खाक के लिए इससे बेहतर जगह और कोई हो सकती है भला ????
मैं आज जरूर अपनी ख्वाहिशों के आसमान में उड़ रही हूँ.........पर मुझे यकीन है कि जिस दिन मेरी थकन को जमीन की जरूरत होगी तुम अपने पांवों को थोड़ा सा हटा कर अपनी जमीन पर मेरे लिए ज़रा सी जगह बना ही लोगे....................
एक बात पूछूं ?? कहीं अब तुमको तो मुझसे जलन नहीं होने लगी है.............






12 comments:

अनिल कान्त said...

भावनाओं और एहसासों से भरी रचना

दिलीप said...

इसीलिए मैंने अपने दिल की एक डोर तुम्हारे पांवों तले की जमीन से बाँध दी है...........जब मैं उड़ते उड़ते थक जाऊं..........भटकते भटकते गुम हो जाऊं जब मेरी रूह को सुकून की जरूरत हो तब तुम्हारे नेह की यही डोर मुझे तुम तक ले आये..........क्योंकि जब एक दिन इस जमीन पर आना है तो क्यूँ न जमीन के उसी हिस्से में आके मिल जाऊं जहाँ तुम्हारे पाँव पड़ते हैं............मेरी खाक के लिए इससे बेहतर जगह और कोई हो सकती है भला ???? in panktiyon ne bahut kuch yaad dilaya...abhar...

अजय कुमार झा said...

धाराप्रवाह लिखी गई पोस्ट

Unknown said...

..मुझे पता है कि एक दिन मुझे भी इसी मिट्टी में मिल जाना है........इसीलिए मैंने इसका एक छोटा सा टुकड़ा अपने पांवों के बीच फंसा रखा है...........जो मुझे हमेशा याद दिलाता रहता है की यही वह जगह है जहाँ आखिरकार मुझको आराम मिलना है.........

Awesome!! Nice read!

Amit
www.xcept.blogspot.com

Rohit said...

क्या बात है....रशक के साथ जीना भी कभी मजा देता है..

शरद कोकास said...

बहुत सुन्दर भाव है ।

अरुणेश मिश्र said...

अन्तर्द्वन्द का सहज परिपाक । प्रशंसनीय ।

Pushpendra Singh "Pushp" said...

बहुत ही सुन्दर पोस्ट
आभार..............

Sanjay Sharma said...

अच्छी रचना है.....

Puja Upadhyay said...

शिखा जी, इज्जत अफजाही के लिए शुक्रिया.आज आपके ब्लॉग पर आई और पढ़ा भी. आप बहुत प्यारा लिखती हैं और दिल से लिखती हैं. बहुत जगह खुद को देखना सा लगा.
ब्लॉग पढ़ने का ज्यादा वक्त नहीं निकाल पाती हूँ, ऑफिस और घर के बीच. लिखना चूँकि आदत है खाने, पीने सोने की तरह तो लिख लेती हूँ.
फुर्सत में किसी दिन आपका ब्लॉग जरूर पढूंगी.
आपके बच्चे बड़े क्यूट हैं. उनका भोलापन सलामत रहे.

Unknown said...

aapka blog mei aaj padha.padh kar kuch purane din bhi yaad aa gaye.mei kavitaon ke bare me jyada to nahi janta hoon lekin aapki kavita dil ko chhu gayi.sach me aap bahut accha likhti hain...

Rohit said...

आप तो सब समझती ही हैं ..आफके लिए क्या गहराई....मिनट में ही आप भांप लेती है....शुक्रिया समझने के लिए....आने के लिए.....पर 23 अप्रैल के बाद आप रुक गईं है क्या मेरी तरह न बनिए......रोज लिखिए..