Tuesday, January 25, 2011

अपरिचित सा.......मेरा वज़ूद !!!!

अपरिचि सा लगने लगा है.......अब मुझको मेरा ही वज़ूद..............क्यूंकि मैं जो हूँ और जो दिखती हूँ..........उसमें उतना ही अंतर है...........जितनी ये धरती और आसमान है दूर.............मेरी नज़रों में स्पष्ट सी पहचान है.......कि क्या सच है और क्या झूठ..........लेकिन मैंने देखा है अक्सर..........खुद को नकारते हुए.......जो कि सामने है मौजूद.............और रहते हुए दुनिया की तरह..........सच के अमृत को छोड़...........झूठ के मीठे नशे में चूर...........मैं जो हूँ वो दिखती नहीं........और जो दिखती हूँ वो हूँ नहीं...........इसलिए अपरिचित सा लगने लगा है.........अब मुझको मेरा ही वज़ूद............कभी कभी मैंने खुद को भी नाकारा है...........झुठलाया है अपने आदर्शों और उसूलों को............खड़ी रही किसी और यथार्थ के धरातल पर...........और कहा वही जो सुनना चाहा दुनिया ने...........मैंने जो कहा वो मेरे विचार थे...........वो तो दुनिया के शब्दों की ही प्रतिध्वनि थी...........और जो कुछ सच में कहना चाहती थी........वो घुट कर रह गया मेरे ही अंतर में..........और मेरा अस्तित्व एक न रह कर दोहरा हो गया..........इसीलिए अपरिचित सा लगने लगा है.........अब मुझको मेरा ही वज़ूद..........



16 comments:

रश्मि प्रभा... said...

अपरिचित सा लगने लगा है.........अब मुझको मेरा ही वज़ूद..........
bahut badhiyaa

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

होता है ऐसा भी ..

Kunwar Kusumesh said...

खुद को विश्लेषित और परिभाषित करती विशेष पोस्ट लगी ये.

वन्दना said...

होता है ऐसा सभीके साथ्।

mridula pradhan said...

..........इसीलिए अपरिचित सा लगने लगा है.........अब मुझको मेरा ही वज़ूद.........
bahut sunder likhi hain.

इमरान अंसारी said...

शिखा जी,

जज़्बात पर आपकी टिप्पणी का आभार.....आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा...दक्षिण के होने के बावजूद आपकी हिंदी अच्छी है......खुद से खुद की पहचान बहुत ज़रूरी है.....ऐसे ही लिखती रहें......शुभकामनायें|

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Udan Tashtari said...

सब अहसासते हैं ऐसा ही..आपने शब्द दिये.

sagebob said...

क्या लिखूं शिखा जी.हर रचनाकार के अन्तर्मन में इक संघर्ष चलता है.क्योंकि कलम हमेशा दिल से लिखा करती है.और दिल कभी झूठ नहीं बोलता.और रहना पड़ता है हमें झूठी दुनिया में.इसी संघर्ष में तो रचना जन्म लेती है.

mukti said...

सच में. हम सभी अपने-अपने वजूद की तलाश में हैं. अच्छी गद्यकविता.

nivedita said...

ये अपरिचित होना ही चिर परिचित है.....

boletobindas said...

ये व्यथा है क्या? बदलना वक्त की नियती है..इंसान में भी कुछ बदलाव आते हैं.....अपने से अपरिचत हो जाता है कई बार इंसान बेहतर है उसे ढंढ ले..

Mithilesh dubey said...

बहुत बाढिया लिखा है आपने ।

Kailash C Sharma said...

खुद अपने वज़ूद को पहचानने का सुन्दर प्रयास..बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति..

amit-nivedita said...

nicely expressed true feelings.

Sunil Kumar said...

वज़ूद को पहचानने का सुन्दर प्रयास..बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति..

देवेन्द्र पाण्डेय said...

अपरिचित सा मेरा वजूद
... आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करती पोस्ट।