Monday, January 10, 2011

तुम !!!!!!!!

तुम !!!!!! मेरे जीवन का केंद्र तुम.........तुम में ही तो बसते हैं मेरे प्राण........तुम हो वहीँ तो हूँ मैं .........जो तुम हो तो मैं हूँ.........तुम हो इसीलिए तो हूँ मैं........तुम मेरे जीवन में आशा का संचार हो........मेरी साँसों का आधार हो तुम .........मेरी आँखों की रोशनी की चमक हो तुम.........मेरी आवाज की खनक हो तुम..........मेरी हर धड़कन का राग हो तुम ........मेरी हर खुशी का राज़ हो तुम.........मेरा गुरूर हो तुम..........मेरा जूनून हो तुम..........मेरे जीवन में प्यार का एहसास हो तुम..........नज़रों के पास रहो या दूर.........मेरे दिल के एकदम करीब हो तुम..........मेरी कविता के हर छंद में हो तुम........मेरी हर कहानी के किरदार में हो तुम.........जिंदगी के सूरज की गरमी हो तुम...........चन्द्रमा की शीतलता ही तुम...........मेरी हर सुबह का पहला ख्याल हो तुम.........मेरी हर शाम का रंगीन अंजाम हो तुम........मेरी हर रात में मेरे साथ जीता हुआ........मेरी आँखों में बसा ख्वाब हो तुम........जो लड़खड़ाने लगूँ तो मुझे थामने वाला सहारा हो तुम..........जो टूट कर बिखरने लगूँ तो मेरा हौसला हो तुम..........मेरी उदासी को परे धकेलने..........मेरे होठों पर चुपके से आकर..........सजने वाली मुस्कराहट हो तुम............मेरे बहते आंसुओं को..........पोंछने आई हवा का झोंका हो तुम.........मेरे अकेलेपन में मेरा आसरा हो तुम...........थक कर हारने लगूँ ...........तो बढ़ते रहने की हिम्मत हो तुम.........मुझमें हर मुश्किल से लड़ते रहने का जज्बा हो तुम...........जब दुनिया के दांव पेंचों से थक जाऊं........तो मेरी दिलपसंद पनाह हो तुम...........तुम जानते हो कि मेरे मन प्राण हो तुम.........



11 comments:

Mukesh Kumar Sinha said...

aapke ye "TUM" se jalan ho rahi hai..:)

sach kahun aapne khubsurat sabdo ko apne man ke bhawon ko peeroya hai, bas uske saleeke se sajane ki jarurat thi...wo nahi kiya aapne..:)

kabhi hamare blog pe aayen mitra..:)

Shikha Deepak said...

मुकेशजी इसीलिए तो इसे "कुछ बेतरतीब सा" लेबेल किया है......

boletobindas said...

आह ये अहसास.... कितना गर्व होता है किसी तुम पर.....सच में जलन तो हो ही जाएगी किसी को भी..भावनाओं के प्रवाह को निकलने दीजिए..एक दिन नदी की तरह रास्ता बना लेगी। खूबसूरत मोड़ों से गुजरते हुए सागर तक मिलने का रास्ता तय कर लेगी।

M VERMA said...

बहुत खूबसूरत है यह एहसास ...
अन्दाज बहुत प्यारा और कवितामयी सी

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

शिखा दीपक जी
नमस्कार !

बहुत ही सुंदर भावों से सज्जित रचना के लिए आभार और बधाई !

मेरे जीवन का केंद्र तुम...
तुम में ही तो बसते हैं मेरे प्राण...
तुम हो वहीँ तो हूँ मैं ...
जो तुम हो तो मैं हूँ...


वाह वाऽऽह ! बहुत ख़ूब !
इश्क़े-मजाज़ी से इश्क़े-हक़ीक़ी में तब्दील हो रही मुहब्बत को आसानी से महसूस किया जा सकता है ।

सांसारिक प्रेम से ईश्वरीय प्रेम और भक्ति मे परिवर्तित होता स्वरूप मेरी एक ग़ज़ल में भी है , कुछ पंक्तियां अपको सादर समर्पित हैं -

किसे पाना मुनासिब है , किसे बेहतर गंवाना है
इधर महबूब है ऐ दिल , इधर सारा ज़माना है

जली है शम्ए-उल्फ़त , रौशनी ख़ुद मुस्कुराएगी
सभी तारीक़ियों को शर्तिया जाना ही जाना है

मुझे उसने क़बूला , मैं उसे तस्लीम करता हूं
ये क़ाज़ी कौन होता है ; किसे कुछ क्या बताना है

यहां मत ढूंढना मुझको , यहां अब मैं नहीं रहता
यहां रहता मेरा दिलबर , ये दिल उसका ठिकाना है



~*~नव वर्ष २०११ के लिए हार्दिक मंगलकामनाएं !~*~

शुभकामनाओं सहित
- राजेन्द्र स्वर्णकार

वन्दना said...

बेहद खूबसूरत अहसास्।

रश्मि प्रभा... said...

bahut hi gahre bhaw

"पलाश" said...

बहुत अच्छा लिखा आपने ।
मन के काफी करीब लगी आपकी रचना

अरुण चन्द्र रॉय said...

बहुत खूबसूरत है यह एहसास ...

JHAROKHA said...

shikha ji
bahut hi anokhe dhang se apne bhavo ko gahrai di hai aapne.
bahut hi sashkt abhivykti---
poonam

राकेश कौशिक said...

अति सुंदर - प्रशंसनीय प्रस्तुति