आज कितने दिन बीत गए तुमको गए हुए..........पीछे रह गयी मैं और तुम्हारे साथ बिताये हुए चंद हसीन लम्हे........मुझे याद है तुमने जाते जाते कहा था अपना ख्याल रखना..........हाँ ख़त लिखती रहना........यकीन करो कई बार कलम उठाई तुमको लिखने के लिए........पर लिख ही नहीं पायी........क्या करूँ.........ये जज्बातों की आँधी जो उठती है तो मुझे जाने कहाँ उड़ा ले जाती है.........कभी माज़ी के उस भूले बिसरे कोने में ले जाती है जहां ढेरों दर्द दफ़न हैं.........जो मुझको फिर से अपने में डुबाने के लिए उछालें मारने लगते हैं.........ज़रा अपने इन जज्बातों पर लगाम तो लगा लूं तो तुम्हे ख़त लिखूं...........
बड़ी मुरादों और दुआओं से पाया था तुमको.............पर ज़माने को ये कहाँ मंज़ूर था.........ढेरों इल्जाम लगाए.........अनगिनत हिदायतें दी गयी...........प्यार करने के जुर्म पर हमको ये जुदाई की सज़ा बख्शी गयी.........ज़ब्त करते करते मैं ग़मों के अंधेरों में बेतरह डूब चुकी हूँ..........ज़रा तुम पर और तुम्हारे प्यार पर मेरे अटूट भरोसे के दीये तो जला लूं तो तुम्हे ख़त लिखूं............
तुमको देखे हुए कितना वक़्त बीत गया..........नज़रों से इस तरह ओझल हो गए हो.........कि कहीं से तुम्हारे दीदार की कोई सूरत नज़र ही नहीं आती........मेरी आँखे तरस रही हैं..........वस्ले यार को तड़पती आँखों को तुम्हारी एक तस्वीर बना कर तो दे दूं तो तुम्हे ख़त लिखूं..........
कितना कुछ है तुमसे कहने को.........जो लिखने बैठूं तो सारे ख्यालों में एक बेचैनी सी मच जाती है........क्या पहले कहूं क्या बाद में..........कोई भी पीछे नहीं रहना चाहता.......कोई भी छूटना नही चाहता........मैं खुद हैरान हूँ परेशान हूँ.........ज़रा अपने इन बेचैन ख्यालों को समझा तो लूं........तो तुम्हे ख़त लिखूं.........
कितना समय हो गया तुमसे बात किये..........ज़माने बीत गए तुम्हारी आवाज़ ही नहीं सुनी..........तुमसे बात न हो तो लगता है दुनिया में और कोई बात ही नहीं सुनने लायक.........पर तुम जो भी मुझसे कहते हो वो सब मुझे याद आता है.........ज़रा उन ग़ज़लों के फूल तो खिला लूं तो तुम्हे ख़त लिखूं...........
तुमने देखा न कितनी उलझी हूँ मैं..........ज़रा खुद को सुलझा तो लूं तो तुम्हे ख़त लिखूं...........
Wednesday, December 29, 2010
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17 comments:
वाह! खत लिखने की कशमकश का बहुत सुन्दर चित्रण किया है।
बहुत ही सुंदर रचना,,,..दिल को छु गयी...आपकी लेखनी में जादू है....बधाई
*काव्य-कल्पना*
आपकी बेचैनी अपनी सी लगती है । सुन्दर अभिव्यक्ति । मेरे ब्लॉग पर भी आयें ।
ufff!!ab wo khat likh hi daliye....:)
aur haan blog pe share jarur kijiyega!
आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (30/12/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.uchcharan.com
बहुत कशिशपूर्ण भावभीनी अभिव्यक्ति..नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं !
या खुदा क्या बात है। इतनी बैचेनी। खत लिखने से पहले इतने ख्याल.....वल्लाह मान गए शिखा जी।
खुद को सुलझा लूं तो ख़त लिखों ...
जज्बातों की आंधी यूँ ही उलझा देती है ...
बेहद भाई मन को यह रचना !
बहुत सुन्दर ...अच्छी लगी यह कशमकश भी
शानदार चित्रण लेखन का। बधाई एवं नववर्ष की शुभकामनाएं।
पुरकशिश अभिव्यक्ति.
सुंदर भावाभिव्यक्तित ।
दिल को छूने वाली खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
सादर,
डोरोथी.
sab haal to likh diye bas pata likhna baaki hai.
sunder khat.
खत का इंतजार रहेगा।
*
नए साल के उजले भाल पे
लिखें इबारत नए ख्याल से।
*
नए साल की शुभकामनाएं।
नए साल की शुभकामनाएं आपको। नये तेवर औऱ नई धार के साथ लेखन कार्य में लगी रहें कामना करता हूं।
खत का इंतजार रहेगा। नए साल की शुभकामनाएं।
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