Thursday, December 23, 2010

तुम्हारी याद............

तुम्हारी याद........जाने किन बीते हुए लम्हों में ले जाती है .......वो तुमसे पहली मुलाक़ात.....इतनी भीड़ के बीच खड़े तुम.........सबसे जुदा दिखते तुम.....तुमको देखा तो तुममें ही खो गयी......उससे भी ख़ास लम्हा........जब तुमने मुझको देखा.........और मैंने तुमको मेरी ओर देखते देखा........वो नज़र......भीतर तक भेद गयी........दिल में कुछ यूँ उतरी........दिल तुम्हारा ही घर हो गया........बस फिर तो हर सांस में तुम........हर धड़कन में तुम........मेरे दिलोजान में बस गए तुम..........एहसास जो मेरे दिल में उठे वही तुम्हारे दिल में भी.......हाल जो मेरा था वही तुम्हारा भी........फिर भी उन्हें बयाँ करने की वो झिझक........ कभी कहा कभी ज़ाहिर किया.......पर आँखों ने राज़ खोल ही दिया.........कितना खुशनुमा था वो समाँ........कितना खूबसूरत एहसास.........कभी जुबाँ से कहा भी नहीं और सब जान भी लिया.....वो डरते झिझकते.......पहली बार पास आना..........तुमने मेरे हाथो को हलके से छुआ........मेरी झुकी हुई नज़रों में जाने क्या पढ़ते रहे........तुम्हारी वो छुअन..........मेरा रोम रोम सिहर उठा........मेरा मन मेरी आत्मा यूँ पिघल कर तुम्हारी बांहों में समा गये.........वो छोटी छोटी मुलाकातें......... कुछ कहना कुछ सुनना..........बस ख़ामोशी के कुछ पल........और एक दूसरे में खोये रहना.........फिर सच्चाई से सामना..........हर मुलाक़ात के बाद वो जुदा होना........हाथों का चाहते हुए भी अलग होना............जाते वक़्त तुम्हारा कभी भी पलट कर देखना..........तुम्हारे जाते ही मेरा नयी मुलाक़ात की आस जोड़ना..........
फिर से उसी आस के साए में बैठी मैं.........तुमसे मिलने का कोई जतन ढूंढती मैं.....तुम्हारी राहों में नज़रें बिछाए मैं.........बीते हुए खूबसूरत लम्हों को बार बार जीती मैं...........इस जुदाई की घड़ी में अकेली मैं......और मेरी तन्हाई बांटने आती........तुम्हारी याद........



7 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

तन्हाई बंटती तुम्हारी याद ....बहुत खूबसूरती से भावों को लिखा है ..

Kailash C Sharma said...

कोमल भावनाओं से परिपूर्ण बहुत सुन्दर प्रस्तुति.

Er. सत्यम शिवम said...

bhut hi imotional,pyaar ka anokha ehsaas.....hota hai jab dilbar ka sath....nice

ashish said...

वाह सुन्दर लगी आपकी अद्भुत फोरमेट में अभिव्यक्ति . आभार .

खबरों की दुनियाँ said...

अच्छी पोस्ट , शुभकामनाएं । पढ़िए "खबरों की दुनियाँ"

Sunil Kumar said...

खुबसूरत अहसासों को समेटे ,दिल कि गहराई से लिखी गयी रचना ,बधाई

boletobindas said...

वाह नहीं लिखा तो नहीं लिखा। लिखा तो धाराप्रवाह। सही कहा है किसी ने की कितना भी बांधो भावों को पहाड़ में फंसी नदी कि तरह एक बार रास्ता बना लेती है तो बह कर ही दम लेती है। जबरदस्त प्रवाह के साथ भाव हैं। इतने दिन साथ रहकर भी अगर कड़वाहटपन अपनो का न हर सके, तो दुख तो होता ही है। अपने टूटने में कोई साथ दे और लगे कि दूसरे का दूख कम नहीं कर पाए तो कभी-कभी अंदर से दुख भी होता है। पर कई लोग अपने दुख को पाल कर रखना पसंद करते हैं. उन्हें कोई नहीं बदल सकता। चाहकर भी। कुछ लोगो के लिए जिंदगी का ये एक ऐसा रंग होता है जिसे देखने के बाद फिर वो जल्दी धोखा नहीं खाता। कोई इसे भूल कर नए सिरे से शुरुआत करता है। ऐसे में अपने को हारा हुआ नहीं मानना चाहिए। मानिए ये कि उस शख्स के जीवन के चंद खुशनुमा पलों के निर्माता आप हैं। उसे जो भी खुशी मिलती है वो आपके सद्प्रयासो से मिलती है। इसमें हारने की तो कोई बात ही नहीं है न। अब ये अलग बात है कि कोई अपने इतने चाहने वाले के होते हुए भी अलग दुनिया बसा के अकेला रहे। उसके लिए बेहतर यही होगा कि हर कुछ वो चाहने वाले पर लाकर शुरु करे औऱ उसी पर खत्म करे। रुहानी दुनिया हो या हकीकत की दोनो में ही खुशियों के पल को इतना फैलाना पड़ता है कि दुख की चादर छोटी हो जाए। ऐसे में कोई भी शाम अगर कोई बिताने वाला साथ मिल जाए तो अपने आप ही खूबसूरत हो जाती है। पर हर किसी को इतना चाहने वाला भी नहीं मिलता। कभी कभी तो जिसे ये नसीब होता है वो ज्यादा खुश होते हुए भी घबड़ाता है कि कहीं उसकी खुशी किस्मत से देखी न जाए ऐसे में वो संयत दिखने की कोशिश करता है। ऐसे में ये चाहने वाले का काम है कि वो एहसास को समझे। अनकहे को सुने। उसकी खामोश शाम में चुपके से ऐसे दाखिल हो जाए जैसे हमेशा वहीं था उसका वजूद। क्योंकि कभी उसने उसका साथ उस वक्त दिया था जब वो लड़की सारी दुनिया में अकेली समझती थी। जो करती थी भला, पर मिला उसे बुरा। अपने रिश्ते बेनामी बने रिश्ते हर जगह से मात खाई थी उसने। वैसे भी ये दस्तूर है कि नेकी कर और कुएं में डाल। कभी उम्मीद न करो। अपनों से तो कभी नही। और कोई उम्मीद से परे जाकर कुछ करे तो उसे ऐहतराम करो, याद रखो। तो जाहिर है ऐसा शख्स जो खुद अकेला होकर बैठे तो चुपके से उसमें प्रवेश कर जाओ। औऱ यहीं पर आकर यादो के सभी समेटे हुए पन्नों को धीरे-धीरे खोलने लगो। पन्नों के जो शब्द समझ में न आए हों कभी वो देखना ऐसे ही मौको पर समझ आने लगते हैं। उनके नए अर्थ खुलने लगते हैं।