जिंदगी होती है जब खुशगवार.............. भरा होता है हर्ष अपार.......... आई हो............ जब भी बहार ................खुशियों की पड़ती हो रिमझिम फुहार ...........हर तरफ जहाँ तक निगाह जाती है.......... इन रिश्तों की फसल नज़र आती है...........इस फसल के बीज जरूरत की मिटटी में बोये जाते हैं........... जिनके फल अपना स्वार्थ सिद्धि होता है...........और जब जिंदगी को कड़ी धूप झुलसाती है............ या अपने स्वार्थ कि सिद्धि हो जाती है ..............तब ये रिश्ते हो जाते हैं अदृश्य ............और खड़े रह जाते हैं हम ठगे से............... सुनसान बियाबान में .............रह जाती है तलाश.......... एक धागा.......... एक कतरा.............. एक अंश............. रिश्तों की.............. तब ये रिश्ते नज़र आते हैं............. मुस्कुराते हुए.............. ओट से किसी और खुशगवार जिंदगी की............... ये रिश्ते !!!!!!!
Wednesday, December 1, 2010
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8 comments:
रिश्तों को खूब उकेरा है शायद ऐसे ही होते हैं।
sahee kaha
बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.
संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com
रिश्तों को लेकर सुन्दर स्रजन किया है आपने!
जब जिंदगी को कड़ी धूप झुलसाती है.. या अपने स्वार्थ कि सिद्धि हो जाती है ...तब ये रिश्ते हो जाते हैं अदृश्य ...और खड़े रह जाते हैं हम ठगे से.. सुनसान बियाबान में...
ये भी जीवन का निर्मम सत्य है ...इसलिए पहले ही खुद को तैयार रखें ...ऐसा भी हो सकता है ...
आपके मन की बात बहुत अपनी सी लगी !
rishte hote hi aise .kbhi apne se kabhi begane se .
बहुत सटीकता से रिश्तों की सच्चाई का चित्रण..बधाई
रिश्तों की सच्चाई का सटीक चित्रण..बधाई
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