Thursday, October 28, 2010

न जाने...........

जाने क्यूँ उम्मीद तेरी
छोड़ नहीं पाते हैं
जिस दिल में तेरा मुकाम था
उसे तोड़ नहीं पाते हैं

फासले जो बन गए
दोनों दिलों के दरम्यान
हम चाह के भी उनको
अब जोड़ नही पाते हैं

समझाते तो हैं अपनी
वफाओं को बहुत फिर भी
बढ़ते जो कदम तेरी तरफ
उन्हें मोड़ नहीं पाते हैं








7 comments:

M VERMA said...

न जाने क्यूँ ...
बहुत सुन्दर

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

फासले जो बन गए
दोनों दिलों के दरम्यान
हम चाह के भी उनको
अब जोड़ नही पाते हैं

न जाने क्यूँ होता है ऐसा ...

mukti said...

आप बहुत दिनों बाद अपनी रचना लेकर आयी हैं. अच्छी रचना है.

Mukesh Kumar Sinha said...

naa jane kyun, mujhe kavita dil ke kareeb laga....:)

boletobindas said...

आपकी बहुत दिन बाद की रचना आज पढ़ रहा हूं। देरी के लिए माफी। दरअसल पिछला एक महीना पूरी तरह से अजीबोगरीब रहा। जिस कारण में पूरी तरह से ब्लॉग से दूर था। खैर अब वापसी हो गई है और निरतंर रहेगी। आपकी रचना किस रास्ते की तलाश में क्या मैं समझ पा रहा हूं। शायद हां भी शायद जानकर भी अनजान। या अपनी मानसिक स्थिती में कुछ और ही समझ पा रहा होउं मैं?

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

शिखा दीपक जी
नमस्कार !
सुंदर सुरुचिपूर्ण लेखन के लिए आभार और बधाई !

आपकी रचनाएं पढ़ कर जाना,
बढ़िया लिखती हैं आप ,
आपकी ता'रीफ़ का लोभ
हम भी छोड़ नहीं पाते हैं


लेकिन अब नया भी कुछ पोस्ट में डालें …

शुभकामनाओं सहित
- राजेन्द्र स्वर्णकार

Sunil Kumar said...

तीन महीने बाद
वह भी तीन शेर के साथ
बहुत नाइंसाफी है
सैकड़ों पाठकों के साथ
सुंदर प्रस्तुति , बधाई