Tuesday, July 13, 2010

तेरे मेरे........

खुल सकते नहीं राज़ तेरे मेरे
दिल की बातें हैं दिल के सायों में

तेरे दिल से मेरे दिल तक
फूल भी कांटे भी इन राहों में

मेरी वफ़ा की देने को गवाही
कुछ आसूँ हैं मेरी आँखों में

महके महके वो एहसास तुम्हारे
अब भी ताज़े हैं इन साँसों में






11 comments:

संजय भास्कर said...

बेहद ख़ूबसूरत और उम्दा रचना लिखा है आपने! बहुत बढ़िया लगा

संजय भास्कर said...

काफी सुन्दर शब्दों का प्रयोग किया है आपने अपनी कविताओ में सुन्दर अति सुन्दर

Vinay Prajapati 'Nazar' said...

very nice ghazal

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूबसूरत

Sunil Kumar said...

सुन्दर अति सुन्दर

boletobindas said...

बढ़िया लिखा है आपने। दिल से दिल तक के रास्ते में फूल हों तो क्या बात है। पर हम तो बिना कांटे डाले मानते ही नहीं। फूलो से भरा प्यार का रास्ता हमें मंजूर कहां। एहसास औऱ जख्म ताजा रहते हैं। एहसास सुखद हो तो फिर क्या बात है। जिंदगी काटी जा सकती है इसके सहारे।

औप हां शिखा जी यात्रा हमेशा साथ चलती है औऱ चलते हैं विचार। पर विचार जब आकार ले लें पर साकार न कर सकें तो तकलीफ ज्यादा होती है। हैरानी होती है कि ज्यादा बड़े लक्ष्य कैसे हार जाते हैं। अगर विचार साकार न हो पाता है तो बैचेनी काफी ज्यादा होती है। इललिए शीर्षक दिया है इस बार अपनी पोस्ट का एक अंतहीन यात्रा रुकी रुकी सी।

boletobindas said...

और हां लखनउ की यात्रा कहां से कर रही हैं। इस यात्रा का विवरण जरुर दीजिएगा अगर लगे की देने लायक हो।

उठा पटक said...

बढिया रचना!

दिगम्बर नासवा said...

महके महके वो एहसास तुम्हारे
अब भी ताज़े हैं इन साँसों में ..

बहुत खूब ... लाजवाब शेर है ये ... महके हुवे एहसास सदा महकते रहते हैं ...

mukti said...

आप कुछ शब्दों में ही एक सुन्दर रचना कर देती हैं... बेहद खूबसूरत.

JHAROKHA said...

shikha ji ,
bahut hi khoob surat lagi aapki gazal.bahut hi badhiya.
poonam